उड़ीसा के बरगढ़ जनपद में स्थित नवप्रभात वैदिक विज्ञान शोध केन्द्र तथा गुरुकुल नवप्रभात वैदिक विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय अखिल भारतीय वैदिक शोध संगोष्ठी वैदिक अध्ययन, अनुसंधान और परंपरा की दृष्टि से अत्यंत ऐतिहासिक, गरिमामयी एवं प्रेरणास्पद सिद्ध हुई। इस राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य वैदिक वाङ्मय, श्रौतयाग, यज्ञविद्या, ब्राह्मण ग्रंथों तथा वैदिक दर्शन के विविध पक्षों पर गंभीर, मौलिक एवं समकालीन संदर्भों से जुड़े शोध कार्यों को सशक्त मंच प्रदान करना था, जिसमें यह आयोजन पूर्णतः सफल रहा।

देश के विभिन्न भागों से पधारे विद्वानों ने अपने-अपने शोध पत्रों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि वैदिक परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य की मानवीय, सामाजिक एवं नैतिक समस्याओं के समाधान का भी एक प्रभावी और प्रासंगिक स्रोत है।
वैदिक संगोष्ठी में भिलाई निवासी प्रख्यात वैदिक विद्वान आचार्य डॉ. अजय आर्य ने शतपथ ब्राह्मण पर आधारित अपना अत्यंत महत्त्वपूर्ण, मौलिक और विचारोत्तेजक शोध पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने शोध का आधार सन् 1973 में प्रकाशित पंडित बुद्धदेव विद्यालंकर कृत, पूज्य समर्पणानंद सरस्वती को समर्पित शतपथ ब्राह्मण को बनाते हुए यज्ञविद्या, सोमतत्त्व तथा “देव” और “व्रत” जैसे शब्दों के गूढ़ दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक आयामों को विद्वतापूर्ण ढंग से स्पष्ट किया।
डॉ. अजय आर्य ने याज्ञवल्क्य ऋषि के वैदिक वचनों का संदर्भ देते हुए कहा कि यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देने की बाह्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि वह मानव जीवन के निर्माण और परिष्कार की एक वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक एवं नैतिक पद्धति है। उन्होंने बताया कि यज्ञ व्यक्ति के मन, प्राण और समाज—इन तीनों के संतुलन, शुद्धि और उन्नयन का प्रभावी माध्यम है तथा शतपथ ब्राह्मण में वर्णित यज्ञ-तत्त्व आज के तनावग्रस्त और मूल्य-विहीन होते जा रहे समाज के लिए भी व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत करता है।

इस विद्वत् सम्मेलन में अपेक्स विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, उत्कल विश्वविद्यालय, ओड़िशा केंद्रीय विश्वविद्यालय, विश्वभारती विश्वविद्यालय तथा गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय सहित देश के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों का प्रतिनिधित्व देखने को मिला। इन संस्थानों से पधारे आचार्यों, कुलपतियों, प्रोफेसरों और शोधार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति ने संगोष्ठी को एक सशक्त राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से अपेक्स विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति डॉ. सोमदेव शतांशु तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर श्रीवत्स निगमालंकार जैसे वरिष्ठ विद्वानों की सहभागिता ने कार्यक्रम की अकादमिक गरिमा को और अधिक समृद्ध किया।
अपने शोध में डॉ. अजय आर्य ने वैदिक ज्ञान की उस अखंड गुरु-शिष्य परंपरा को भी विशेष रूप से रेखांकित किया, जो ब्रह्मा से प्रारंभ होकर जैमिनी ऋषि तक प्रवाहित हुई और आधुनिक काल में स्वामी पूर्णानंद, उनके शिष्य विरजानंद, तत्पश्चात महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद, समर्पणानंद तथा वर्तमान में स्वामी विवेकानंद सरस्वती द्वारा सशक्त रूप से प्रतिष्ठित और संरक्षित की जा रही है। उन्होंने इस परंपरा को भारतीय बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चेतना की रीढ़ बताते हुए कहा कि इसी के माध्यम से वैदिक ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बना हुआ है। आचार्य डॉ. अजय आर्य स्वयं इसी गौरवशाली परंपरा से जुड़े वैदिक विद्वान हैं तथा वे पूज्य स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य हैं।

डॉ. अजय आर्य के शोध पत्र की विद्वतापूर्ण, सुस्पष्ट और प्रभावशाली प्रस्तुति से प्रभावित होकर अपेक्स विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति डॉ. सोमदेव शतांशु ने उन्हें विशेष आशीर्वाद प्रदान किया और कहा कि ऐसे शोध कार्य वैदिक अध्ययन को नई दिशा देने में अत्यंत सहायक सिद्ध होते हैं। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर श्रीवत्स निगमालंकार ने कहा कि डॉ. अजय आर्य का कार्य वैदिक ग्रंथों को आधुनिक संदर्भों में समझने और समाज तक सरल रूप में पहुँचाने की दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं सराहनीय है।
इस संगोष्ठी में महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के रवि प्रभात, उस्मानिया विश्वविद्यालय के विद्यानंद शास्त्री, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विनोद कुमार, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वेदव्रत, लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ. सत्यकेतु, हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय उत्तराखंड के डॉ. विश्वेश तथा प्रेम प्रकाश शास्त्री सहित अनेक विद्वानों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। आचार्य बृहस्पति एवं आचार्य भगवान देव इस कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार रहे।

अपने उद्बोधन में आचार्य डॉ. अजय आर्य ने नवप्रभात वैदिक विद्यापीठ को “पूर्व का तक्षशिला” बताते हुए कहा कि इस पावन भूमि पर कदम रखते ही पूज्य गुरुदेव स्वामी विवेकानंद जी महाराज की आध्यात्मिक ऊर्जा का सजीव स्पंदन अनुभव होता है, जो मन और विचारों में सकारात्मक, सृजनात्मक तथा आध्यात्मिक चेतना का संचार करता है।
समग्र रूप से यह द्विदिवसीय अखिल भारतीय वैदिक शोध संगोष्ठी वैदिक वाङ्मय, शतपथ ब्राह्मण और यज्ञविद्या के पुनरुद्धार एवं पुनर्पाठ की दिशा में एक सशक्त, सार्थक और दूरगामी प्रयास सिद्ध हुई। डॉ. अजय आर्य का प्रस्तुत शोध न केवल अकादमिक जगत के लिए, बल्कि वैदिक जीवन-दृष्टि को व्यवहार में उतारने वाले साधकों, शिक्षकों और समाज के लिए भी एक प्रेरणास्रोत के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।डॉ० सुकान्ताः आर्य, एवं निखिलेश प्रधान कार्यक्रम की संयोजक थे।




