खुश रहो और खुश रखो जो मुस्कुराता नहीं है, ईश्वर उससे दूर हो जाता है
भिलाई। धार्मिक जीवन, धर्म की अनुभूति को आनंदित बनाता है’ स्वयं को ‘धन’ समझिए क्योंकि धरती पर आपसे कीमती कोई नहीं है। ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्’ संकीर्ण सोच वाले ही स्वयं को कम आंकते हैं, उदार हृदय वाले हर जीव में ईश्वर का अंश देखते हैं। आज मनुष्य हर अच्छी वस्तु करने के बाद पाना चाहता है। स्वर्ग करने के बाद, मोक्ष करने के बाद, बीमा करने के बाद, दान करने के बाद। जबकि जीवन का सत्य यही है कि सुख जीने के भीतर है, बाद में नहीं।
प्रवचन में कहा गया कि बीमा कंपनियाँ लाभ बाद में देती हैं, पर जीवन अभी लाभ देता है। बस जीने के फायदे ढूँढने की आवश्यकता है। ‘जीने में सुकून ढूँढिए, मरने के फायदे मत ढूँढिए।’ वेद वचन ‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ जीवन की पूर्णता का बोध कराता है। प्रार्थना को आज लोग याचना समझ बैठे हैं। जिस प्रकार शहर में कार, कपड़े और अनाज की दुकानें होती हैं, उसी प्रकार ईश्वर को भी लोगों ने दुकानदार की भाँति समझ लिया है—कहीं माँग लो, कहीं सौदा कर लो। जबकि प्रार्थना मांगने का नहीं, कृतज्ञता व्यक्त करने का मार्ग है। जब हृदय धन्यवाद से भरता है, तब विनम्रता स्वभाव बन जाती है। तुलसीदास कहते हैं—‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

शास्त्रों के अनुसार ‘शरीर रथ है, आत्मा रथी।’ मनुष्य शरीर से नहीं, चरित्र, विवेक और आचरण से पहचाना जाता है। लोग कहते हैं कि जनसंख्या बढ़ रही है; पर यदि सच्चे मनुष्य बढ़ते तो मनुष्यता भी बढ़ती। प्रेम, शांति, सद्भाव और सहयोग की कमी इसी का संकेत है। प्रवचन में कहा गया- दुनिया में नकली नोट नहीं चलता, पर नकली आदमी चल जाता है, और वही समाज को सबसे अधिक चोट पहुँचाता है।” ऋग्वेद मनुर्भव मानव-जीवन में ज्ञान और विवेक की अनिवार्यता को दर्शाता है।
आज समाज बाहरी दिखावे में उलझा हुआ है। हर व्यक्ति अच्छा दिखने की कोशिश करता है, चाहे भीतर कितना भी तनाव हो। प्रवचन में कहा गयाहै- सुंदर मत दिखो, सुंदर बनो। बाहर का रूप थोड़ा समय चमकता है, पर भीतर के गुण जीवन भर जगमगाते हैं। कबीरदास कहते हैं‘सुंदर तन मन की सुंदरता, संसार सगुण सँवारै। ’प्रवचन में दो रोचक प्रसंग भी प्रस्तुत किए गए। एक राजा ने अपने सेवक से पूछा कि महल में सबसे सुंदर क्या है। सेवक बोला- महाराज, महल नहीं, आपका हृदय सुंदर है क्योंकि वही महल को पवित्र बनाता है।” इससे संदेश दिया गया कि सुंदरता वस्त्रों में नहीं, चरित्र में बसती है। दूसरा प्रसंग—एक गुरु ने शिष्य को कोरा कागज देकर कहा कि इस पर मनुष्यता लिखकर दिखाओ। शिष्य बोला- मनुष्यता लिखी नहीं जाती, जी जाती है।’ गुरु ने कहा- यही समझना जीवन की सबसे बड़ी विद्या है।

डॉ. अजय आर्य ने प्रवचन के मध्य एक हास्य-संदेश भी दिया। आजकल लोग चेहरे पर क्रीम इतनी लगाते हैं कि पहचानना मुश्किल हो जाता है कि चमक त्वचा की है या महँगी क्रीम की। मन की चमक हो तो चेहरा खुद-ब-खुद खिल जाता है। श्रोताओं ने मुस्कुराते हुए इस संदेश का आनंद लिया। प्रवचन में चेतावनी भी दी गई कि लोग धन कमाने की होड़ में अपनी उम्र, नींद और सेहत खो देते हैं। अंत में प्रश्न यही उठता है धन का उपयोग कौन करेगा? जो मुस्कुराता नहीं, वह धीरे-धीरे जीवन से दूर हो जाता है।
इस अवसर पर डॉ. अजय आर्य ने ‘धार्मिक जीवन- धर्म जीवन को आनंदित बनाता है’ विषय पर विस्तृत और आध्यात्मिक प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ पूजा-पाठ भर नहीं, बल्कि मनुष्यता, संयम, करुणा और संतुलित जीवन है। धार्मिक जीवन व्यक्ति को भीतर से स्थिर करता है और जीवन को आनंदमय बनाता है। इस प्रेरणादायक सत्संग और प्रवचन का आयोजन पतंजलि योग समिति और वैदिक सत्संग समिति ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम का वातावरण आध्यात्मिक और ऊर्जा-समृद्ध रहा। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन राजेंद्र अग्रवाल द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में प्रोफेसर कप्तान, देवी साहू प्रताप गुप्ता पोपटानी, मोहनलाल चढ़ा शिवन गुप्ता, किरण साहू , रवि, श्रुति कुंबलकर, अल्पना, गायत्री आदर्श, नवीन शर्मा सहित गणमान्य लोगों ने भाग लिया।




