Tuesday, October 20, 2026

क्या टूट की कगार पर है सपा-कांग्रेस गठबंधन? सीट शेयरिंग और बयानबाजी बनी बड़ी वजह

आलोक तिवारी / नईदिल्ली-लखनऊ लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ साथ लड़ने वाले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच विधानसभा चुनाव से पहले खटास बढ़ती दिख रही है। इंडिया गठबंधन में बयानों पर रोक के समझौते के बावजूद यूपी में दोनों दलों के नेता अलग-अलग सुर में बोल रहे हैं, जिससे गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।

कोड आॅफ कंडक्ट टूटा, जुबानी जंग तेज
सूत्रों के मुताबिक इंडिया गठबंधन की बैठकों में तय हुआ था कि कोई भी दल सार्वजनिक रूप से दूसरे पर टिप्पणी नहीं करेगा। अखिलेश यादव ने तो अपनी पार्टी में इसको लेकर कोड आॅफ कंडक्ट भी लागू किया था। लेकिन पहले कांग्रेस नेता इमरान मसूद और बाद में यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बयानों के बाद तल्खी बढ़ गई। जवाब में एसपी ने भी दो टूक कहा कि गठबंधन करना है तो जल्द फाइनल करें, नहीं तो पार्टी अकेले तैयारी कर रही है।

राहुल-अखिलेश बैठक में क्या तय हुआ था?
संसद के मानसून सत्र के दौरान राहुल गांधी के कमरे में राहुल, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव की बैठक हुई थी। सूत्रों के अनुसार अखिलेश ने शर्त रखी थी कि कांग्रेस जिन सीटों की मांग कर रही है, वहां उम्मीदवार जिताऊ होना चाहिए। एसपी का तर्क है कि अक्सर स्थानीय बड़े नेता अपने करीबियों के लिए टिकट मांग लेते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रयागराज और सीतापुर में कांग्रेस के पास मजबूत चेहरे न होने पर एसपी ने अपने नेताओं उज्जवल रमन सिंह और राकेश राठौर को कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर लड़ाया था। अखिलेश इस बार यह दोहराना नहीं चाहते।

कांग्रेस में दो राय
कांग्रेस के अंदर भी दो धड़े हैं। एक धड़ा मानता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में मुस्लिम और दलित वोट राहुल गांधी के कारण गठबंधन को मिला, इसलिए पार्टी दलित, मुस्लिम, ओबीसी और सवर्णों के सहारे अकेले भी जमीन तलाश सकती है। दूसरा धड़ा व्यावहारिक है, जो मानता है कि यूपी में एसपी के बिना चुनाव जीतना मुश्किल है और शीर्ष नेतृत्व अंत में मामला सुलझा लेगा।

अखिलेश का प्लान-बी तैयार
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 के अनुभव को देखते हुए अखिलेश यादव कोई रिस्क नहीं लेना चाहते। एसपी का मानना है कि विधानसभा चुनाव स्थानीय समीकरण और सीएम चेहरे पर लड़ा जाता है। अंदरखाने अखिलेश करीब 150 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय कर चुके हैं। संकेत साफ है कि अगर सीट शेयरिंग पर बात नहीं बनी तो एसपी 403 सीटों पर अकेले लड़ने को तैयार है।

क्या यह प्रेशर पॉलिटिक्स है?
अगस्त के पहले हफ्ते में राहुल गांधी ने यूपी के कांग्रेस सांसदों की बैठक में अक्टूबर तक सीट बंटवारे का फॉमूर्ला तय करने की डेडलाइन दी थी। इसके बाद भी बयानबाजी तेज होना राजनीतिक जानकार प्रेशर टैक्टिस मान रहे हैं, ताकि सीटों के मामले में दूसरे पक्ष पर दबाव बनाया जा सके।
फिलहाल राहुल गांधी और अखिलेश यादव की व्यक्तिगत केमिस्ट्री मजबूत दिखती है, लेकिन जमीनी स्तर पर वर्चस्व की लड़ाई गठबंधन की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनती दिख रही है।

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