Saturday, March 14, 2026

नारी के योगदान का अभिनंदन: सेवा, शिक्षा और सृजन की प्रतीक महिलाओं का सम्मान

वैदिक सत्संग समिति ने दुर्ग की प्रतिष्ठित महिलाओं को किया सम्मानित
‘कुछ नहीं करने वाली’ गृहिणी भी परिवार की असली आधारशिला है: आचार्य डॉ. अजय आर्य

वैदिक सत्संग समिति, रायपुर की ओर से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर दुर्ग शहर की चार प्रतिष्ठित महिलाओं को उनके उत्कृष्ट कार्यों और समाज में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय महिलाओं की उपलब्धियों को सराहा गया तथा उनके योगदान को समाज के लिए प्रेरणादायी बताया गया।
सेवा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने वाली व्यवसायी हेमा सक्सेना (पत्नी श्री ओजस्वी सक्सेना) को सामाजिक सेवा में उनके अमूल्य योगदान के लिए सम्मानित किया गया। उल्लेखनीय है कि हेमा सक्सेना लंबे समय से समाज सेवा के विविध कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं और जरूरतमंदों की सहायता के लिए निरंतर प्रयासरत रहती हैं।

इस अवसर पर आरती श्रीवास्तव ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का एक सशक्त साधन है। उन्होंने कहा कि एक महिला के रूप में वे परिवार, करियर और सामाजिक जिम्मेदारियों को साथ लेकर आगे बढ़ने में विश्वास रखती हैं। एक माँ के रूप में उनके ट्विन्स बच्चे उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उनका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि सेवा भाव के साथ समाज के लोगों की मदद करना, उन्हें प्रेरित करना और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। उन्होंने कहा कि जब महिला शिक्षा, आत्मविश्वास और सेवा की भावना के साथ आगे बढ़ती है, तो वह न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बनती है।

समाज सेविका, लेखिका और कवयित्री डॉ. अल्पना त्रिपाठी को भी सम्मानित किया गया। वे महिलाओं के सामाजिक योगदान को रेखांकित करने के लिए विभिन्न माध्यमों से कार्य करती रही हैं। उन्होंने महिलाओं के जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत करते हुए अनेक काव्य रचनाएँ भी की हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में लगभग 40 वर्षों तक महत्वपूर्ण योगदान देने वाली शिक्षिका नीता दास को भी इस अवसर पर सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने लंबे शिक्षण काल में छात्र-छात्राओं को न केवल शिक्षा प्रदान की, बल्कि उन्हें नैतिक मूल्यों और संस्कारों के प्रति भी निरंतर प्रेरित किया।
वैदिक सत्संग समिति के अध्यक्ष राजेंद्र अग्रवाल ने कहा कि महिलाओं का समाज के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी महिलाओं को देश, समाज और परिवार का निर्माता माना है।

समिति के संरक्षक राकेश दुबे ने कहा कि वर्तमान के विज्ञापन युग में महिलाओं को केवल बाहरी रूप और शरीर तक सीमित करके प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवत्व का अधिष्ठान माना गया है। इसी भावना से हमारे शास्त्रों में “मातृ देवो भव” का संदेश दिया गया है।

समिति के प्रेरक आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि किसी भी रूप में महिलाओं की योग्यता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आज भी कई स्थानों पर गृहिणियों का परिचय यह कहकर दिया जाता है कि वे कुछ नहीं करतीं, जबकि सच्चाई यह है कि परिवार और समाज की मजबूत नींव के पीछे उन्हीं का समर्पण और परिश्रम होता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के आदर्श केवल बाहरी आकर्षण तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि वे महिलाएँ भी हैं जिन्होंने दर्शन, अध्यात्म, व्यापार और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में सफलता का परचम लहराया है। महिलाएँ न केवल परिवार बल्कि पूरे विश्व को दिशा देने की क्षमता रखती हैं। महर्षि दयानंद का वैदिक दृष्टिकोण यह मानता था कि महिलाएं वंदनीय है। उन्होंने देवताओं को जन्म दिया है।

उन्होंने सभी से आह्वान किया कि महिला दिवस के अवसर पर हम महिलाओं के आत्मसम्मान की रक्षा करने का संकल्प लें और उनके योगदान को विनम्रता के साथ स्वीकार करें। शहरों में महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक अवसर और सम्मान मिल रहा है, किंतु ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में आज भी कई महिलाएँ न्याय और सम्मान से वंचित हैं। सच्चा महिला दिवस तभी होगा जब हम अपने आसपास की बहनों-बेटियों और घरों में काम करने वाली महिलाओं को भी जागरूक कर उनका सम्मान सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे।
इस अवसर पर डॉ. अजय आर्य ने वह लिखित पुस्तक मुझको भी जीने की वजह दे दो भेंट की।

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