भिलाई। ईश्वर को शास्त्रों में सच्चिदानंद स्वरूप कहा गया है, अर्थात् सत्य, चेतना और आनंद का साकार रूप। इसी भाव को केंद्र में रखते हुए आयोजित सत्संग चौपाल में आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि जब ईश्वर स्वयं आनंद स्वरूप है, तो उसके भक्तों के चेहरे पर रूखापन और उदासी क्यों दिखाई देती है। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि कई बार भक्त अत्यंत गंभीर, बुझे-बुझे और तनावग्रस्त दिखाई देते हैं, जबकि सच्ची भक्ति का पहला लक्षण आनंदित जीवन जीना है। सत्संग चौपाल को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य चेहरे पर मुस्कान और जीवन में संतुलन लाना है, न कि बोझ और भय पैदा करना।
हास्य, व्यंग्य, प्रेरणा और शास्त्रीय विचारों के सहज समन्वय के साथ आचार्य डॉ. अजय आर्य ने ऐसा प्रवचन प्रस्तुत किया जिसमें जीवन के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ते चले गए और उनके उत्तर मुस्कान के साथ मिलते चले गए। उन्होंने प्रश्न किया कि मनुष्य इतना गंभीर क्यों रहता है, जब वह हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति में जी रहा है। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण उदाहरण देते हुए कहा कि कैमरे के सामने फोटो खिंचवाते समय मुस्कान आवश्यक समझी जाती है, क्योंकि मुस्कान से चित्र सुंदर बनता है, तो फिर ईश्वर के सामने खड़े जीवन का चित्र मुस्कान से क्यों न सजे। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाया कि मुस्कान केवल सामाजिक औपचारिकता नहीं, बल्कि आंतरिक विश्वास और आत्मिक संतोष की अभिव्यक्ति है।
इसी क्रम में उन्होंने अगले प्रश्न की ओर श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया कि आज तनाव और अवसाद क्यों बढ़ रहे हैं। एक प्रेरक प्रसंग के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य की चिंता में वर्तमान को नष्ट करना, ईश्वर के कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप है। जो व्यक्ति ईश्वर पर विश्वास करता है, वह न आत्महत्या की ओर बढ़ता है, न अवसाद को जीवन का साथी बनाता है और न ही तनाव के साथ खेलता है। उन्होंने कहा कि झुर्रियाँ उम्र से नहीं, चिंता से आती हैं और मुस्कान आत्मा का वह श्रृंगार है जो भीतर से जीवन को सुंदर और संतुलित बनाता है।
प्रवचन आगे बढ़ते हुए धर्म के मर्म तक पहुँचा। आचार्य डॉ. अजय आर्य ने प्रश्न उठाया कि क्या धर्म केवल पूजा-पाठ, मंदिर, घंटी और कर्मकांड तक सीमित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म का वास्तविक अर्थ व्यक्तित्व का विकास है—ऐसा व्यक्तित्व जो केवल अपने हित तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के लिए भी कल्याणकारी और प्रेरणादायक बने। इसी संदर्भ में उन्होंने नीतिशतकम् का प्रसिद्ध श्लोक प्रस्तुत किया और श्लोक का अर्थ स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि संसार में चार प्रकार के मनुष्य होते हैं- सत्पुरुष जो स्वार्थ का त्याग कर परोपकार के लिए जीते हैं, सामान्य जन जो स्वार्थ और परार्थ में संतुलन रखते हैं, मानुष राक्षस जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को हानि पहुँचाते हैं और और इस राक्षसों से भी अधम हैं, जो अपना लाभ हो या ना हो दूसरों की हानि करने में ही अपनी सफलता समझते हैं। कुछ लोगों को दूसरों को नुकसान करके आनंद मिलता है। भर्तृहरि ने कहा कि ऐसे लोगों को क्या कहूँ मुझे समझ नहीं आता। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को पहली श्रेणी, अर्थात् सत्पुरुष बनने की दिशा में ले जाना है।
प्रवचन का निष्कर्ष अत्यंत व्यावहारिक और जीवनोपयोगी रहा। आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि ईश्वर यह नहीं पूछेगा कि कितनी माला जपी गई या कितने कर्मकांड किए गए, वह यह देखेगा कि हमारे कारण कितने चेहरे मुस्कुराए और कितनों का जीवन थोड़ा हल्का हुआ। धर्म डराने या बोझ डालने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को आनंदमय, संतुलित और अर्थपूर्ण बनाने की कला है। कार्यक्रम की मुख्य संयोजिका मधु त्रेहन रहीं और इस सत्संग चौपाल में शिव अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, पुरुषोत्तम अग्रवाल, राव साहब, अशोक त्रेहन, मधु त्रेहन, राव जयश्री, शशि जायसवाल और सिद्धार्थ की सक्रिय और गरिमामयी उपस्थिति रही।
क्या है सत्संग चौपाल?
अंत में सत्संग चौपाल की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि यह बिना किसी खर्च, कर्मकांड या औपचारिकता का ऐसा मंच है, जहाँ पाँच से दस मित्र या परिजन एकत्र होकर जीवन और धर्म की सार्थकता पर विद्वानों के साथ संवाद कर सकते हैं। न किसी प्रचार की आवश्यकता होती है, न भीड़ जुटाने की केवल आत्मिक चर्चा, सहज संवाद और जीवन को बेहतर बनाने वाले विचारों का आदान-प्रदान होता है। आप भी अपने घर या मोहल्ले में सत्संग चौपाल का आयोजन कर सकते हैं और मुस्कान, विश्वास तथा सद्भाव के इस संदेश को समाज में आगे बढ़ा सकते हैं। जिन घरों में बच्चे परेशान है या आत्मविश्वास खो रहे हैं। जहां परिवार को प्रेरणा की आवश्यकता है वहां पर ऐसे आयोजन करने के लिए निशुल्क और नि:स्वार्थ रूप से संपर्क किया जा सकता है। आचार्य अजय आर्य का मानना है कि आने वाली पीढ़ी और वर्तमान विद्यार्थी तनाव झेल रहे हैं। ऐसे में हम लोगों को स्वयं सकारात्मक रूप से हल्के अंदाज में बच्चों के पास पहुंचना होगा। यही सच्चा सत्संग है।





