Sunday, April 19, 2026

बुद्धिजीवी फिल्म समीक्षक संघ, दुर्ग ने देखी “द बंगाल फाइल्स”

भारत की नियति और बंगाल की अनकही सच्चाई को उजागर करती साहसिक फिल्म

दुर्ग। बुद्धिजीवी फिल्म समीक्षक संघ, दुर्ग द्वारा निर्माता–निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री की बहुचर्चित फिल्म “द बंगाल फाइल्स” का सामूहिक अवलोकन किया गया। समीक्षकों ने इसे एक ऐतिहासिक, विचारोत्तेजक और सच्चाई को उजागर करने वाली फिल्म करार दिया। उनके अनुसार यह केवल सिनेमा नहीं, बल्कि इतिहास का वह आईना है जिसमें वर्तमान और भविष्य दोनों झलकते हैं।

निर्माता–निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि इस फिल्म के लिए चार वर्षों तक गहन रिसर्च किया गया। 20 राज्यों की यात्रा, 100 से अधिक पुस्तकों का अध्ययन और 7,000 से ज्यादा पन्नों के शोध से यह फिल्म तैयार हुई है। उनका कहना है-
“अगर बंगाल पाकिस्तान को दे दोगे, तो क्या बंगाली संगीत, बंगाली भाषा और बंगाली भोजन को भी दे दोगे? बंगाल को मारोगे तो भारत-भारत नहीं रहेगा। ज़मीन का टुकड़ा नहीं, इंडिया का लाइटहाउस है बंगाल।”

कार्यक्रम के के अध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार मौर्य ने फिल्म के दमदार डायलॉग का उल्लेख करते हुए कहा-
“तू बता सकता है, इन में से, वी द पीपल ऑफ भारत कौन है? भारतीय कौन है?”
उन्होंने कहा कि यह संवाद हर भारतीय को भीतर तक झकझोर देता है और हमें अपनी पहचान, एकता और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने के लिए प्रेरित करता है।

वरिष्ठ समीक्षक डॉ. अजय आर्य ने कहा कि फिल्म का हर दृश्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब जिहाद की आड़ में भीड़ पागल बनती है तो उसका शिकार केवल हिंदू महासभा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के दफ्तर भी होते हैं। उन्होंने इसे वर्तमान समाज के लिए चेतावनी करार दिया।

फिल्म देखने वालों में डॉ. अनुपम मौर्य, साँचली, विकास यादव, आशुतोष सिंह, पुरुषोत्तम साहू, अमित राजपूत, डी.के. यादव, महेंद्र साहू, पतिराम साहू सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे। सभी ने फिल्म को एक साहसिक प्रयास बताते हुए इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

फिल्म समीक्षक संघ ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि ऐतिहासिक तथ्यों और साहित्यिक मूल्यों पर बनी फिल्मों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। ऐसी फिल्में कब आती हैं और कब जाती हैं, यह दर्शकों को पता ही नहीं चलता। थिएटर तक पहुंचने के बाद भी इनके पोस्टर नहीं लगाए जाते और इन्हें सीमित स्क्रीन पर रिलीज़ किया जाता है, जो सही नहीं है।

संघ ने स्पष्ट कहा कि “द बंगाल फाइल्स” किसी वर्ग विशेष की नहीं है, क्योंकि जिहादी और उन्मादी भीड़ व्यक्ति और संस्था में भेद नहीं करते। फिल्म में दिखाया गया है कि जहां जस्टिस बनर्जी की हत्या भीड़ द्वारा हुई और हिंदू महासभा के लोगों को क्रूरता से काटा गया, वहीं कांग्रेस के दफ्तर को भी आग के हवाले कर दिया गया।

फिल्म में “बंगाल का कसाई” कहे जाने वाले किरदार ने हिंदुओं को संगठित कर नरसंहार रोकने की कोशिश की। उसका संदेश था कि बिना संगठित हुए और बिना शक्ति के प्रतिकार किए बगैर किसी भी हिंसा को नहीं रोका जा सकता। यही वह बात थी जिससे जिन्ना तक घबराया था कि कहीं हिंदू समाज एकजुट न हो जाए।

संघ ने कहा कि यह फिल्म किसी जाति, धर्म या क्षेत्र का पक्ष नहीं लेती, बल्कि यह इतिहास के काले अध्याय को सामने रखकर आने वाली पीढ़ियों को चेताने वाली है। बुद्धिजीवी फिल्म समीक्षक संघ, दुर्ग सभी नागरिकों से आग्रह करता है कि वे इस फिल्म को अवश्य देखें।यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को समझने, उसकी जड़ों को पहचानने और उसके भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प है। जो सच से मुँह नहीं मोड़ना चाहते, उनके लिए “द बंगाल फाइल्स” एक आंखें खोल देने वाला अनुभव है।

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