दुर्ग जिले में खनिज विभाग की चौंकाने वाली सुस्ती ने सैकड़ों छोटे ठेकेदारों की कमर तोड़कर रख दी है। नगर निगम, नगर पंचायत और नगर पालिका परिषदों में होने वाले विकास कार्यों का अंतिम भुगतान खनिज विभाग द्वारा जारी किए जाने वाले ‘गौण खनिज रॉयल्टी चुकता प्रमाणपत्र’ पर निर्भर करता है, परंतु विगत दो वर्षों से जिला खनिज शाखा समय पर ये प्रमाणपत्र जारी करने में बुरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
सिस्टम का स्टिंग — जिम्मेदार कौन, नुकसान किसका?
शहर में नालों की खुदाई से लेकर सड़कों की मरम्मत तक, तमाम छोटी-बड़ी परियोजनाएँ ठेकेदारों के माध्यम से संचालित होती हैं। नियम स्पष्ट है —
- काम में प्रयुक्त गौण खनिज की मात्रा की पुष्टि के बाद ही खनिज विभाग रॉयल्टी चुकता प्रमाणपत्र जारी करेगा।
- इसी प्रमाणपत्र को देयक में संलग्न कर ठेकेदार अपना अंतिम भुगतान प्राप्त कर सकता है।
लेकिन—
दो साल से खनिज विभाग के तथाकथित “परीक्षण” और “फाइल प्रोसेस” के नाम पर छोटे ठेकेदारों के भुगतान को जानबूझकर रोका जा रहा है।
ठेकेदारों की फरियाद — “घर चलाना मुश्किल हो गया है”
कई ठेकेदारों ने कलेक्टर और उपसंचालक, खनिज शाखा, दोनों को बार-बार आवेदन दिए, लेकिन परिणाम—
आश्वासन
झूठी तारीखें
अधूरी प्रक्रिया
और
कोई प्रमाणपत्र नहीं!
एक ठेकेदार ने बताया—
“हमारे परिवार की पूरी जिम्मेदारी हमारे ऊपर है। बच्चों की स्कूल फीस, घर का खर्च… सब ठप पड़ा है। विभाग सिर्फ तारीखें देता है, प्रमाणपत्र नहीं।”
सितंबर में दिया गया जवाब भी निकला खोखला
प्राप्त अभिलेखों के अनुसार, उपसंचालक खनिज शाखा ने 8 सितंबर 2025 को जवाब दिया कि—
“54 प्रकरणों का परीक्षण कर 25 अगस्त 2025 को नस्ती कलेक्टर महोदय के समक्ष प्रस्तुत कर दी गई है। नस्ती प्राप्त होने के 2–3 दिवस में प्रमाणपत्र जारी कर दिए जाएंगे।”
लेकिन अब दिसंबर आ गया है— तीन महीने बीत चुके हैं— फिर भी एक भी प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ।
सवाल खड़े हो रहे हैं—
क्या वह नस्ती कलेक्टर कार्यालय में ही अटक गई?
क्या कलेक्टर ने स्वयं इस मुद्दे पर रुचि नहीं ली?
या फिर खनिज विभाग किसी दबाव में काम रोक रहा है?
क्या विभाग जानबूझकर ठेकेदारों को आर्थिक रूप से तोड़ने पर तुला है?
स्टिंग ऑपरेशन का खुलासा — जवाबदेही शून्य!
जांच में सामने आया कि—
- खनिज विभाग में फाइलें महीनों तक टेबल से टेबल घूमती रहती हैं।
- किसी अधिकारी को स्पष्ट जवाब देने की जिम्मेदारी नहीं है।
- ठेकेदारों द्वारा बार-बार याद दिलाने पर भी विभाग “जल्द जारी होगा” कहकर पल्ला झाड़ लेता है।
- कलेक्टर कार्यालय भी इस संवेदनशील मुद्दे पर उदासीन दिखाई दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल—
क्या यह सामान्य देरी है या जानबूझकर खड़ा किया गया “भ्रष्टाचार का बैरियर”?
छोटे ठेकेदारों की आवाज — “हमें न्याय चाहिए!”
प्रशासन की इस सुस्ती से न सिर्फ विकास कार्य बाधित हो रहे हैं, बल्कि कई छोटे ठेकेदार कर्ज में डूबने की कगार पर पहुँच चुके हैं। सवाल यह नहीं कि फाइल कहाँ अटकी है…
सवाल यह है कि जिम्मेदारी किसकी है?
कलेक्टर की?
उपसंचालक खनिज शाखा की?
या फिर पूरे सिस्टम की?
- ठेकेदारों की साफ मांग है—
- विलंबित सभी प्रकरणों का तत्क्षण निपटान हो
- जवाबदेही तय की जाए
- और भ्रष्टाचार या दबाव की जाँच कराई जाए
