Sunday, April 19, 2026

आर्यवीर दल दुर्ग का आयोजन

आर्य समाज का आह्वान चरित्र निर्माण शिविर से इतिहास, बलिदान और संस्कारों का जागरण,सिख गुरुओं के बलिदान को किया नमन

अभिभावकों से वीर बालकों का इतिहास सुनाने का किया आह्वान

भिलाई। आर्य समाज द्वारा आयोजित आर्य वीर दल का चरित्र निर्माण शिविर आज की युवा पीढ़ी को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ अपने गौरवशाली इतिहास और बलिदानी परंपरा से जोड़ने का सशक्त अभियान बन गया है। इस शिविर में लगभग 150 युवक एवं 80 युवतियाँ एक साथ योग, ध्यान, प्राणायाम, दंड-बैठक, लाठी संचालन के साथ वैदिक अनुशासन का अभ्यास कर रही हैं। प्रतिदिन संध्या मंत्र पाठ, यज्ञ और हवन शिविर का अनिवार्य अंग हैं, जिससे संपूर्ण वातावरण साधना, संयम और राष्ट्रबोध से अनुप्राणित हो उठा है। आर्य समाज का स्पष्ट उद्देश्य है कि युवा केवल शारीरिक रूप से सबल न हों, बल्कि संस्कारित, अनुशासित और राष्ट्र के प्रति समर्पित नागरिक बनें।शिविर के संचालन में अवनी भूषण पुरंग, गीता आर्य, नरेंद्र आर्य, कृष्णमूर्ति, तुषार और साक्षी प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं। सोनीपत से आए मुख्य प्रशिक्षक संदीप आर्य ने अनुशासन के महत्व पर बल देते हुए कहा कि समर्पण और त्याग ही जीवन और राष्ट्र निर्माण के मूल आधार हैं। अंकित शर्मा शास्त्री शिविर में आए बच्चों को नैतिक एवं माध्यमिक शिक्षा दे रहे हैं।

आर्य समाज ओर से डॉ. अजय आर्य ने सिख गुरुओं के बलिदान को नमन किया। उन्होंने टोडरमल जैन के अद्वितीय त्याग का भावपूर्ण स्मरण कराया और बताया कि जब सरहिंद में गुरु गोविंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों को अमानवीय अत्याचार के बाद दीवार में चुनवा दिया गया और उनके अंतिम संस्कार तक की अनुमति नहीं दी जा रही थी, तब टोडरमल जैन ने शासकों की अमानवीय शर्त स्वीकार करते हुए सोने की मुद्राएँ खड़ी करके वह भूमि खरीदी, जहाँ साहिबजादों का अंतिम संस्कार संभव हो सका। अपना सब कुछ बेचकर 780 किलो सोने की स्वर्ण मुद्राएं देकर चार गज जमीन खरीदी थी। यह संसार की सबसे महंगी भूमि नहीं, बल्कि मानवता, धर्म और संस्कृति के लिए दिया गया अनुपम बलिदान था, जिसने भारतीय चेतना को अमर बना दिया।

इसी क्रम में गुरु गोविंद सिंह जी के चारों साहिबजादों साहिबजादा अजीत सिंह, साहिबजादा जुझार सिंह, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह के अमर बलिदान को स्मरण कराया गया। एक ही सप्ताह में पूरा गुरु परिवार शहीद हो गया। बड़े साहिबजादे रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए और छोटे साहिबजादों को निर्दयता से दीवार में चुनवा दिया गया। अत्याचार की पराकाष्ठा तब हुई, जब उन मासूम बच्चों को एक गिलास दूध के लिए भी कीमत चुकानी पड़ी। यह केवल एक परिवार का विनाश नहीं था, बल्कि सनातन संस्कृति, मानवीय मूल्यों और धर्म की रक्षा के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान था, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।

आर्य समाज ने स्पष्ट और कठोर शब्दों में संदेश दिया कि जो समाज अपने इतिहास और अपने बलिदानी पूर्वजों को भूल जाता है, वह अपनी संस्कृति को बचा नहीं सकता। गुरु गोविंद सिंह जी केवल सिखों के ही नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए पूजनीय हैं, जो देश, समाज और संस्कृति को बचाना, बढ़ाना और संवारना चाहता है। आज आवश्यकता दिखावटी उत्सवों में डूबने की नहीं, बल्कि उन वीर बालकों और महापुरुषों को स्मरण करने की है, जिनके बलिदान पर हमारी सभ्यता और स्वतंत्रता टिकी है।

आर्य समाज ने युवाओं से आग्रह किया कि वे सेंटा और फेंटा जैसी विदेशी और दिखावटी परंपराओं से दूर रहकर चरित्र निर्माण की ओर अग्रसर हों। आर्य समाज का यह चरित्र निर्माण शिविर युवाओं के भीतर संस्कार, साहस और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व जगाने का जीवंत माध्यम बन रहा है।

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