Saturday, March 7, 2026

बस्तर में खात्मे की ओर नक्सलवाद क्या सीपीआई तलाश पाएगी अपनी राजनीतिक जमीन…

बस्तर में माओवादी प्रभाव घटते ही सीपीआई फिर मैदान में उतरी। दंतेवाड़ा में युवाओं ने लाल झंडा थामा। क्या लौट रहा है कम्युनिस्ट दौर? पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

(वरिष्ठ पत्रकार सुरेश महापात्रा) / दंतेवाड़ा | बस्तर! कभी नक्सलवाद की लपटों से झुलसती यह धरती अब एक नए राजनीतिक समीकरण की गवाही दे रही है।वो सीपीआई (भारत की कम्युनिस्ट पार्टी), जिसने कोंटा और दंतेवाड़ा में कभी जनता के दिलों पर राज किया, अब फिर से अपने पुराने जनाधार की तलाश में मैदान में उतर आई है।

एक दौर था जब बस्तर की गलियों में “लाल सलाम” गूंजता था।मगर जैसे-जैसे नक्सल गतिविधियां बढ़ीं, सीपीआई का जनाधार टूटता चला गया। बीते दो दशकों में यह प्रभाव लगभग सिमट गया — लेकिन अब, जब माओवाद अपने अंत की ओर है, तो सीपीआई फिर से अपने राजनीतिक विस्तार की बिसात बिछा रही है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त करने का ऐलान किया है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है —“नक्सलवाद खत्म होने के बाद बस्तर का राजनीतिक चरित्र कैसा होगा?”

बस्तर की सामाजिक बुनावट जटिल है —यहां आदिवासी, हिंदू आदिवासी और धर्मांतरण कर चुके ईसाई आदिवासी तीनों समूह सक्रिय हैं।

इनके बीच दफनाने और जलाने की परंपराओं को लेकर लगातार संघर्ष भी देखा जा रहा है।पर आश्चर्य की बात यह है कि माओवाद प्रभावित इलाकों में धर्मांतरण के विवाद कभी सामने नहीं आए।

अब जबकि माओवादी प्रभाव घट रहा है, बस्तर के शहरी हिस्सों में सीपीआई फिर से ‘लाल झंडे’ के साथ वापसी की तैयारी में है।

दंतेवाड़ा की सड़कों पर सोमवार की सुबह लंबे अरसे बाद युवाओं को सीपीआई का झंडा बाँधते देखा गया।

याद रहे — यही दंतेवाड़ा था, जहां 2003 में डॉ. रमन सिंह की परिवर्तन यात्रा के दौरान भाजपा का झंडा बाँधने वाले कार्यकर्ता गिनती के थे।

आज वही सड़कों पर लाल झंडे लहरा रहे हैं।

जब पत्रकार सुरेश महापात्रा ने युवाओं से पूछा —“अब सीपीआई का झंडा क्यों?”तो जवाब आया —“बाहर से नेता आ रहे हैं… सभा होगी…”और सचमुच, सभा हुई भी!यह दृश्य सिर्फ एक राजनीतिक गतिविधि नहीं,बल्कि बस्तर के बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक दौर का संकेत है।

अगले अंक में आंकड़ों के साथ होगी पूरी रिपोर्ट…फिलहाल, तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं!—

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