महर्षि वाल्मीकि :संपूर्ण मानवता के कवि और युगों-युगों के पथप्रदर्शक
आदि कवि ने रामायण के माध्यम से दिया लोकमंगल और आदर्श जीवन का संदेश: डॉ. अजय आर्य
दुर्ग। आर्य समाज दुर्ग में महर्षि वाल्मीकि जयंती श्रद्धा और साहित्यिक गरिमा के साथ मनाई गई। मुख्य वक्ता आर्य समाज के आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि किसी एक समाज या वर्ग के कवि नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कवि हैं। उन्होंने अपने जीवन और साहित्य के माध्यम से यह सिद्ध किया कि हर व्यक्ति अपने कर्म, ज्ञान और साधना से महानता प्राप्त कर सकता है।
डॉ. आर्य ने कहा कि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण केवल कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन का पथप्रदर्शक ग्रंथ है, जो आदर्श, मर्यादा, संयम और करुणा का अद्वितीय संगम है। उन्होंने बताया कि राम आदर्श और त्याग का प्रतीक हैं, जबकि रावण सोने-चाँदी और सुख-संपत्ति के बावजूद हमेशा अतृप्त रहा। रामायण हमें यह सिखाती है कि जीवन में सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना कठिन है, पर वही मार्ग स्थायी और सार्थक होता है।
उन्होंने आगे कहा कि वाल्मीकि का जीवन स्वयं प्रेरणा है-आर्य समाज रत्नाकर की कहानी को प्रक्षिप्त मानता है। रत्नाकर से वाल्मीकि बनने की यात्रा यह सिखाती है कि सच्चा परिवर्तन भीतर की आह से जन्म लेता है। जब उन्होंने क्रौंच पक्षी के वियोग में करुण आह सुनी, तब उनसे स्वतः यह श्लोक निकला-
“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः…”
यही वह क्षण था जब करुण हृदय से कविता निकल पड़ी। “ इसी करुणा से लौकिक साहित्य का उदय हुआ और वाल्मीकि आदिकवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। वाल्मीकि का जीवन हमें करुणा और संवेदनशील बनने के लिए आह्वान करता है। डॉ.आर्य ने कहा कि रामायण में श्रीराम का चरित्र हमें सिखाता है कि नेतृत्व विनम्रता और करुणा से संपूर्ण होता है। रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि लोकमंगल की दिशा है, जिसमें परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण के आदर्श निहित हैं।
छत्तीसगढ़ प्रांतीय आर्य प्रतिनिधि सभा के मंत्री एवं आर्य समाज दुर्ग के प्रधान अवनी भूषण पुरंग ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने वाल्मीकि रामायण को ही प्रमाणिक और शुद्ध ग्रंथ माना है, क्योंकि इसमें धर्म, नीति और मानवीय मूल्य का सटीक समन्वय है। प्रवीण गुप्ता ने कहा कि वाल्मीकि की रचना केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली योजना है। श्रीराम के माध्यम से उन्होंने जनमानस को यह सिखाया कि सत्य और कर्तव्य ही मानवता का मूल धर्म है।
कार्यक्रम के अंत में शांतिपाठ हुआ। उपस्थित जनों ने संकल्प लिया कि वे महर्षि वाल्मीकि के आदर्शों और रामायण की शिक्षाओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य करेंगे।




