00 हरेली पर्व पर किसान हल,नागर, गैंती,कुदारी, फावड़ा सहित हसिंया औजार की पूजा अर्चना करते हैं,
00 हरेली पर्व पर बांस की बनी गेडी का भी एक अलग महत्व है,
00 हरेली पर्व पर पूजा अर्चना के समय चिला,पूड़ी और कच्चा नारियल का प्रसाद चढ़ाएं जाते हैं,
(यतेन्द्र जीत सिंह छोटू ब्यूरो चीफ जिला खैरागढ़)
खैरागढ़ : हरेली का पर छत्तीसगढ़ के लोग प्रकृति हरियाली व कृषि के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को समर्पित करते हुए आभार प्रदर्शित करने के लिए मानते हैं।।विभिन्नताओं का देश भारत जिसके गगन ताली न जाने कितनी संस्कृति फल फूल रही है।।
यही अनेकता में एकता को भारत की संस्कृति एक धागे में पिरोए रखती है
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में पाव त्योहार का एक विशेष स्थान है।। इसलिए हरेली को छत्तीसगढ़ की संस्कृति व परंपरा का पहले त्योहार कहा गया है।। हरेली का त्यौहार छत्तीसगढ़ में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष अमावस्या के दिन मनाया जाता है।। यह त्यौहार कृषि से संबंध रखता है।। हरेली मतलब धरती को प्रकृति की हरि चुन्नी से दुल्हन की तरह सजना।।

किसान खेत में धान की बुवाई, रोपाई व बियासी के काम को पूरा करने के बाद इस त्यौहार को मानते हैं
यह त्यौहार किसानो की समृद्धि का त्यौहार है।। यह सदियों से चली आ रही है, हमारी परंपरा रीति रिवाज और अनुष्ठानों को बरकरार रखना है, यह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति की पहचान है।।हरेली का त्यौहार जीवन व जमीन, मनुष्य व प्रकृति के बीच के सुख व समृद्धि के गहरे संबंध की पहचान है।
इस दिन कृषक वर्ग अपने गोधन को नहला-धुला कर साफ सुथरा व सुसज्जित करते है।। खेती में काम आने वाले औजारों जैसे हल( नागर)कुदाली , फावड़ा , गैंती,हसियां आदि को धोकर घर के आंगन में मूरम का सुंदर सा बिछौना बनाकर उस पर सुसज्जित कर पूजा की तैयारी करते हैं साथ ही कुल देवता की भी पूजा अर्चना करते हैं।।
इस दिन घरों में विशेष रूप से चीला और नारियल का प्रसाद चढ़ाया जाता है, साथ ही पुरी भी बनाया जाता है।।

हरेली के दिन बांस से बनी गेडी का विशेष महत्व है
गेड़ी बनाकर बच्चे उसमें चढ़कर खेलते हैं,यह बांस से बनता है ऐसी मान्यता है की पुराने समय में गांव में बरसात के दिनों के समय रास्ते में कीचड़ बहुत होने के कारण लोग चल नहीं पाते थे।। इसलिए बांस की गेड़ी बनाकर उस पर चढ़कर रास्ता पार करते थे।। इस दिन सभी के घरों में यादव व लोहार जाति के लोग नीम की डाली तोड़कर घरों के दरवाजों पर लगाते हैं ,नीम में औषधि गुण होते हैं ,जो बीमारियों के साथ-साथ कीड़ों को भी रोकते हैं।।
लोहार जाति के लोग घर-घर जाकर दरवाजे पर खिला ठोकते हैं
ऐसा माना जाता है कि लोहार चौखट पर कील ठोक कर आशीर्वाद देते हैं ऐसा करने से उस घर में रहने वालों की अनिष्ट से रक्षा होती है इस दिन घरों के दरवाजे पर गाय के गोबर से हरेली देव का चित्र भित्ति चित्र भी बनाया जाता है, जिससे बलाएं दूर होती है, वह बुरी दृष्टि से सुरक्षा होती है।।

इस दिन नारियल फेंकने की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है
इस दिन नारियल फेंक सहित महिलाएं को खो-खो व फुगड़ी खेलती है, फुगड़ी खेलने के पूर्व छत्तीसगढ़ी गीत गोबर दे बछरू गोबर दे, गया जाता है, तदुपरांत फुगडी खेली जाती है ।। इस खेल का संबंध योग से भी है, इस खेल से हमारे शरीर के सभी अंगों का व्यायाम होता है, हम इस तरह से कह सकते हैं कि यह हमारे शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक है, हमारे शरीर के सारे अंगों को यह स्वस्थ रखने में सहायक होता है ।।
हरेली का यह पर्व हमारे कृषक वर्ग के लिए सुख और समृद्धि का पर्व है ,इसलिए इसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।।





