‘खाली सरकारी जमीन पर शहरी वन बनाएं, कंक्रीट नहीं’: सिंघवी ने मुख्य सचिव को लिखा पत्र

भीषण गर्मी और अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव पर जताई चिंता, कहा- अब अस्तित्व बचाने का समय

रायपुर: छत्तीसगढ़ में पड़ रही ऐतिहासिक भीषण गर्मी के बीच हर खाली शासकीय भूमि पर “शहरी वन” विकसित करने की मांग उठी है। पर्यावरण कार्यकर्ता सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर रायपुर, दुर्ग और राजनांदगांव की खाली सरकारी जमीनों पर आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं का विरोध किया है। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या हम भविष्य में अपने अस्तित्व को लेकर थोड़े भी चिंतित हैं?”

आधे हेक्टेयर पर भी बने शहरी वन
पत्र में कहा गया है कि रायपुर के शांति नगर और बीटीआई कॉलोनी सहित कई शहरों की खाली शासकीय भूमि पर निर्माण के प्रस्ताव मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति को भेजे गए हैं। सिंघवी ने मांग की कि बढ़ते “अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” को देखते हुए हर उपलब्ध सरकारी जमीन, चाहे वह आधा हेक्टेयर ही क्यों न हो, पर शहरी वन विकसित किए जाएं। उन्होंने पहले भी इस संबंध में पत्र लिखा था।

कंक्रीट बढ़ा रहा शहरों का तापमान
सिंघवी ने बताया कि कंक्रीट, लोहा और डामर की सड़कें दिन में गर्मी सोखती हैं और रात में छोड़ती हैं, जिससे शहरों का तापमान बढ़ता है। इसे ही “अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” कहते हैं। रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बिलासपुर में आम जनता, मजदूर, रिक्शा चालक, गिग वर्कर्स, किसान और झुग्गी बस्तियों के लोग गर्मी से सबसे ज्यादा परेशान हैं।

‘सर्वाइवल बन सकता है मुख्य जॉब’
पत्र में चेतावनी दी गई है कि जलवायु संकट इतना विकराल हो रहा है कि आने वाले वर्षों में गर्मियों में बच्चों का बाहर खेलना मुश्किल हो सकता है। अगले दशक में गरीबों, किसानों और मजदूरों का मुख्य काम “सर्वाइवल” यानी जीवित रहना बन सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2027 अब तक का सबसे गर्म वर्ष हो सकता है।

तालाबों से हटे कंक्रीट, सड़कों से पेवर
सिंघवी ने मांग की कि शहरों-गांवों के तालाबों के चारों ओर अनावश्यक कंक्रीटीकरण और रिटेनिंग वॉल्स हटाई जाएं, ताकि भूजल रिचार्ज बढ़े। कॉलोनियों में अनावश्यक कंक्रीट और पेवर शोल्डर्स हटाकर हरित सतह विकसित की जाए। उन्होंने कहा कि यूरोप के कई देश शहरी गर्मी कम करने के लिए अनावश्यक कंक्रीट और डामर हटाने के अभियान चला रहे हैं।

‘विकास या अस्तित्व, तय करना होगा’
पत्र में कहा गया है कि किसी भी विभाग में निर्णय लेने से पहले जलवायु संकट और जैव-विविधता के पतन को ध्यान में रखना जरूरी है। “हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम जलवायु परिवर्तन के कारण अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित हैं? अब तय करना है कि हम क्या चाहते हैं— विकास या अपने नागरिकों का अस्तित्व। यह समय अस्तित्व बचाने की तैयारी का है।”

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