00 अत्यंत दुःखद एवं हृदयविदारक समाचार…
(यतेन्द्र जीत सिंह छोटू ब्यूरो चीफ जिला खैरागढ़)
खैरागढ़: राजपरिवार की वरिष्ठ सदस्य एवं प्रेम कुमार सरस्वती शिशु मंदिर की आजीवन प्रधानाचार्य रहीं सुश्री राजलक्ष्मी सिंह का रविवार की देर रात 12:36 बजे, 69 वर्ष की आयु में निधन हो गया।। वे लगभग कुछ महीनों से अस्वस्थ चल रही थीं।।
उनके निधन का समाचार केवल एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि उन हजारों विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षा जगत के लिए अपूरणीय क्षति है
जिनके जीवन को उन्होंने अपने ज्ञान, अनुशासन, स्नेह और संस्कारों से सींचा।
पूरा जीवन शिक्षा के नाम कर दिया
राजलक्ष्मी सिंह ने आजीवन अविवाहित रहकर अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा और समाजसेवा को समर्पित किया।।उन्होंने शिक्षिका के रूप में नौकरी नहीं की, बल्कि शिक्षा को अपना जीवन-धर्म बनाया।।अस्वस्थ होने तक वे निरंतर विद्यालय में अपनी सेवाएं देती रहीं।। विद्यार्थियों के प्रति उनका लगाव इतना गहरा था कि विद्यालय और बच्चे उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे।।
छात्रों के बीच वे बेहद आत्मीयता से ‘राज दीदी’ के नाम से प्रसिद्ध थीं
उनके लिए हर बच्चा केवल विद्यार्थी नहीं था,वह उनके परिवार का हिस्सा था।
जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा का उठाया बीड़ा
राजलक्ष्मी सिंह का व्यक्तित्व सेवा और त्याग का अद्भुत उदाहरण था।। उन्होंने अनेक जरूरतमंद एवं आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दिलाई।। कई बच्चों की पढ़ाई में उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सहयोग किया, ताकि आर्थिक परिस्थितियां उनकी शिक्षा के रास्ते में बाधा न बनें।।
इतना ही नहीं, सरस्वती शिशु मंदिर के अतिरिक्त कक्ष के निर्माण के लिए उन्होंने अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा दान कर दिया।। आज जब लोग अपनी कमाई और सुविधाओं के बारे में सोचते हैं, उस दौर में उन्होंने अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों के भविष्य और विद्यालय के निर्माण में लगा दिया।।यही त्याग उन्हें सामान्य शिक्षिका से अलग बनाता है।।
पिता के संस्कारों को जीवन में उतारा
राजलक्ष्मी सिंह राजनीतिज्ञ एवं समाजसेवी स्व. लाल शरण सिंह की सुपुत्री थीं।।
उन्होंने अपने पिता से मिले सेवा, समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण के संस्कारों को अपने जीवन में पूरी निष्ठा के साथ उतारा।। उन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि विचार और संस्कार केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में दिखाई देते हैं।। पिता के सामाजिक जीवन की विरासत को उन्होंने शिक्षा और सेवा के माध्यम से आगे बढ़ाया।।
हजारों विद्यार्थियों के जीवन में छोड़ी अमिट छाप
उनके मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त करने वाले असंख्य विद्यार्थी आज समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।।
उन विद्यार्थियों के लिए ‘राज दीदी’ केवल उनकी प्रधानाचार्य नहीं थीं।।
वे थीं -एक मार्गदर्शक…
एक अभिभावक…
एक अनुशासक…
एक स्नेहमयी दीदी…
और जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणास्रोत।।
उनके पढ़ाए हुए विद्यार्थी जब भी अपने विद्यालय के दिनों को याद करेंगे, तो ‘राज दीदी’ का स्नेहिल चेहरा उनकी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेगा।
आज शरीर हमारे बीच नहीं है, लेकिन संस्कार हमेशा जीवित रहेंगे
कुछ लोग अपने जीवन की लंबाई से नहीं, बल्कि अपने कर्मों की गहराई से याद किए जाते हैं।। राजलक्ष्मी सिंह भी उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक थीं।।
उन्होंने न कोई व्यक्तिगत संपत्ति बनाने की दौड़ लगाई, न अपने जीवन को सुख-सुविधाओं के पीछे लगाया।। उन्होंने अपना जीवन बच्चों को शिक्षित करने, संस्कारित करने और समाज के भविष्य को गढ़ने में लगा दिया।।
उनका जीवन हम सभी के लिए यह संदेश छोड़ गया
“सच्ची सेवा वही है, जिसमें अपना जीवन दूसरों के भविष्य को बेहतर बनाने में लगा दिया जाए।”
आज ‘राज दीदी’ भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा दिए गए ज्ञान, संस्कार, अनुशासन और सेवा के भाव उनके विद्यार्थियों और समाज के माध्यम से सदैव जीवित रहेंग।।
अंतिम यात्रा निकाली
सोमवार की सुबह 10 बजे राजपरिवार स्थिति उनके निवास स्थान से उनकी अंतिम यात्रा निकाली, उनको उनके विधालय सरस्वती शिशु मंदिर ले जाया गया जहां शिशु मंदिर परिवार ने विद्यालय परिसर पर उन्हें नम आंखों से अंतिम बिदाई दी, जहां विधालय परिवार के शिक्षक शिक्षिकाओं सहित व्यवस्थापक परिवार ने अपने बड़ी दीदी और छात्र-छात्राओं ने राज दीदी को अंतिम बिदाई देते हुए फफक पड़े।। उसके बाद उनके पार्थिव शरीर को राजपरिवार के लालपुर स्थित मुक्तिधाम में राजपरिवार के सदस्यों सहित शिशु मंदिर परिवार, जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक,छात्र एवं शुभ चिंतकों ने उन्हें नम आंखों से अंतिम बिदाई दी।। उन्हें उनके भतीजे सांसद प्रतिनिधि एवं जिला पत्रकार संघ के संरक्षण भागवत शरण सिंह (डंपी) ने मुखाग्नि दी।।
वे सांसद प्रतिनिधि एवं समाजसेवी भागवत शरण सिंह जी की बुआ थीं।।




