दुर्ग। ”हौसलों के तरकश में कोशिश का वो तीर जिंदा रख,
हार जा चाहे जिंदगी में सब कुछ, मगर फिर से जीतने की उम्मीद जिंदा रख!”
यह पंक्तियाँ किसी और पर नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी के अनमोल रत्न डॉ. विजय कुमार गुप्ता ’मुन्ना’ के जीवन पर सटीक बैठती हैं। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक युग की है, जिसमें पसीने से उद्योग का साम्राज्य खड़ा हुआ और आंसुओं से संवेदनाओं का साहित्य रचा गया।
1. झोपड़ी का वो आंगन और पिता का वो कठोर सत्य
12 मई 1956 को जब विजय जी ने आंखें खोलीं, तो चांदी का चम्मच मुंह में नहीं था। बचपन दुर्ग की एक झोपड़ी में बीता, जहाँ दीवारों में दरारें तो थीं, लेकिन पिता के संस्कारों की नींव फौलाद से भी मजबूत थी।
मात्र 21 साल की उम्र (1978) में, जहाँ युवा दिशाहीन भटकते हैं, पिता ने अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी इकलौते बेटे के हाथ में रख दी। ‘विजय इंडस्ट्रीज’ की शुरुआत केवल एक फैक्ट्री की शुरुआत नहीं थी, वह एक पिता के विश्वास की अग्निपरीक्षा थी।
संवाद जो पत्थर की लकीर बन गया: पिता ने कहा था— “बेटा, जो दूसरों के लिए गड्ढे खोदते हैं, वे एक दिन खुद उसमें गिरते हैं।” इन शब्दों ने विजय जी के भीतर ईमानदारी और कर्मठता का वो बीज बोया, जो आज 48 वर्षों से एक वटवृक्ष बनकर खड़ा है। बिना अनुभव और बिना पर्याप्त धन के, छत्तीसगढ़ की प्रथम कोरोगेटेड इकाई खड़ी करना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
2. चुनौतियों का चक्रव्यूह और साक्षात मौत से मुकाबला
विजय जी का जीवन करुण रस की गहराइयों से होकर गुजरा है। फैक्ट्री शुरू ही हुई थी कि माँ को लकवा मार गया। विवाह के बाद जिम्मेदारी का बोझ बढ़ा। एक तरफ छोटे पुत्रों की परवरिश, दूसरी तरफ बीमार माता-पिता और व्यापारिक प्रतिद्वंद्वियों का बिछाया जाल।
इसी बीच काल का क्रूर पंजा झपटा—एक भीषण एक्सीडेंट। शरीर लहूलुहान था, हड्डियां टूट चुकी थीं, पर नियति को हारना पड़ा क्योंकि विजय जी की साँसों में अपनों का दुआओं भरा कवच था। उस ‘पुनर्जन्म’ ने विजय जी को यह सिखा दिया कि—
“गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में,
वो तिफ्ल (बच्चा) क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले!”
3. ‘मुन्ना’: एक नाम नहीं, माँ-बाप की जीवित विरासत
माता-पिता के जाने के बाद और अपनों के आघात से ‘मुन्ना’ नाम जैसे इतिहास के पन्नों में दब गया था। लेकिन डॉ. विजय जी ने अपने काव्य सृजन के साथ इस नाम को उपनाम के रूप में जोड़कर समाज को एक बड़ा सन्देश दिया। यह उपनाम उनके माता-पिता के प्रति उनके अगाध प्रेम का प्रतीक है। आज जब दुनिया उन्हें ‘मुन्ना’ के नाम से जानती है, तो उन्हें अपनी माँ की लोरी और पिता की पुकार सुनाई देती है।
4. सेवा का महायज्ञ: जेसीस और लायंस का स्वर्णिम काल
विजय जी ने समाज को केवल लिया नहीं, भरपूर दिया है। व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में आप एक ‘संस्था’ बन गए।
JCI का शिखर: 1990 के अध्यक्ष से लेकर 1996 में राष्ट्रीय प्रशिक्षक और जोन प्रेसिडेंट तक का सफर। भारत के 20 जोन्स में सर्वश्रेष्ठ जोन प्रेसिडेंट का सम्मान प्राप्त करना कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी। ‘सेनेटरशिप’ और 2023 में ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट’ आपके कद को हिमालय जैसा ऊँचा बनाती है।
लायंस क्लब का समर्पण: लायंस क्लब दुर्ग सिटी के अध्यक्ष और डिस्ट्रिक्ट 3233 C के विभिन्न उच्च पदों पर रहते हुए आपने ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ के मंत्र को जीया।
D³ सिद्धांत: आपने युवाओं को सिखाया— Develop to Defeat your Deadline। “नो डिले, नो सॉरी” आपकी कार्यशैली का वो हिस्सा है जिसने आपको एक ‘मास्टर ट्रेनर’ के रूप में स्थापित किया।
5. साहित्य की साधना: जहाँ शब्द ‘ब्रह्म’ बन गए
1995 में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की जयंती पर माँ सरस्वती ने आपकी जिह्वा पर निवास किया और पहली कविता का सृजन हुआ। फिर तो कारवां बढ़ता गया।
अटल और मोदी जी की प्रशंसा: तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यालय से प्राप्त सम्मान पत्र इस बात का प्रमाण हैं कि आपकी कविताएं देश की धड़कन को छूती हैं।
वक्त के साथ संवाद: आपके 8 काव्य संग्रह (करवट लेता समय से लेकर सृजन पल का काव्य कुंड तक) समय की गति को परिभाषित करते हैं। 600 कविताएं, 1000 दोहे और मुक्तामणि छंदों का विशाल भंडार समाज की समस्याओं का ‘समाधान’ प्रस्तुत करता है।
6. उपलब्धियों का इंद्रधनुष
डॉक्टर की उपाधि: थावे विद्यापीठ द्वारा 2024 में विद्या वाचस्पति (डॉक्टरेट)।
अंतरराष्ट्रीय मान: दुबई में साहित्य वैभव शिखर सम्मान 2023।
नगर का मान: दुर्ग नगर निगम के सर्वश्रेष्ठ स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर।
गहोई गौरव: अपने समाज का सर्वोच्च सम्मान और मैथिलीशरण गुप्त सम्मान।
7. परिवार: संस्कारों की सर्वश्रेष्ठ पूंजी
आज 69 वर्ष की आयु में भी विजय जी सुबह से रात तक फैक्ट्री में पसीना बहाते हैं। उनकी सबसे बड़ी दौलत उनके तीन सुपुत्र (विशाल दीप, ऋषिराज, राजदीप) हैं, जो आज वैश्विक स्तर पर स्थापित हैं। अपनी धर्मपत्नी शशिप्रभा जी के बारे में वे भावुक होकर कहते हैं कि उनके बिना यह यात्रा अधूरी थी। हर कविता सबसे पहले उन्हें सुनाना, उनके अटूट प्रेम का प्रमाण है। पोते-पोतियां (विहान, सौरिश, प्रिशा, सवेरा) उनके जीवन की संध्या को स्वर्णिम बना रहे हैं।
उपसंहार: आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा
डॉ. विजय कुमार गुप्ता ’मुन्ना’ का जीवन एक मशाल है। वह सिखाते हैं कि गरीबी, बीमारी, एक्सीडेंट और धोखे भी आपका रास्ता नहीं रोक सकते यदि आपके पास गुरु यज्ञानंद ब्रह्मचारी जी का आशीर्वाद और पिता के दिए संस्कार हों।
”वक्त के दरिया में कश्ती वो निकालते हैं,
जो लहरों से नहीं, खुद के हौसलों से संभलते हैं!”
आज डॉ. विजय जी केवल एक उद्योगपति नहीं, बल्कि एक ‘समय-साधक’ हैं, जो अपनी लेखनी और कर्म से छत्तीसगढ़ का मस्तक गर्व से ऊंचा कर रहे हैं।
डॉ. विजय कुमार गुप्ता ’मुन्ना’
(डॉक्टरेट, उद्योगपति, राष्ट्रीय प्रशिक्षक, साहित्यकार)
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
सभी शुभचिंतक गणो द्वारा समर्पित
