पटना | 25 अक्टूबर 2025 : बिहार इस समय दो महापर्वों का साक्षी है —
एक तरफ़ लोकआस्था का महासागर उमड़ रहा है छठ महापर्व के रूप में,
तो दूसरी ओर लोकतंत्र का महासमर यानी विधानसभा चुनाव का प्रचार-प्रसार पूरे जोश पर है।
गंगा, तालाब और पोखरों के घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ आस्था में डूबी है, वहीं सड़कों, नुक्कड़ों और मैदानों पर नेताओं की रैलियाँ जोश में गूंज रही हैं।
एक ओर व्रती महिलाएँ सूर्यदेव को अर्घ्य देने की तैयारी में जुटी हैं,
तो दूसरी ओर राजनीतिक दल मतदाताओं का “अर्घ्य” पाने की कोशिश में मंथन कर रहे हैं — अपने घोषणापत्रों को अंतिम रूप दे रहे हैं।
आस्था और राजनीति — दोनों का ताप एक साथ
इस समय बिहार की हवा में दो तरह की गर्माहट घुली हुई है —
एक सूर्य की आराधना की तपस्या की,
दूसरी राजनीतिक बहसों की तपिश की।
गली-गली में छठ के गीत गूंज रहे हैं — “केलवा जे फरेला घवद से ओ पिया”,
और उसी गली के मोड़ पर पार्टी के झंडे और बैनर लहरा रहे हैं — “विकास के वादे, बदलाव की बात।”
जनता दोनों रूपों में सक्रिय है —
दिन में चुनावी चर्चाओं में भाग ले रही है,
और शाम को घाटों पर दीप और आस्था की ज्योति जला रही है।
“छठ” — जो बिहार को जोड़ता है, बाँटता नहीं
राजनीति जहाँ अक्सर समाज को जाति और वर्गों में बाँटने की कोशिश करती है,
वहीं छठ महापर्व हर भेदभाव को मिटाकर सबको एक सूत्र में जोड़ देता है।
सूर्यदेव को अर्घ्य देते समय किसी से यह नहीं पूछा जाता कि वह किस जाति या बिरादरी का है।
व्रती को हर कोई सादर प्रणाम करता है — चाहे वह किसी भी वर्ग या विचारधारा का क्यों न हो।
घाट पर हर व्यक्ति एक ही नाम से जाना जाता है — भक्त, श्रद्धालु, बिहारी।
यही तो बिहार की आत्मा है — संवेदनाओं, आस्था और सामाजिक समरसता की धरती।
चुनावी मंथन और जनता की अपेक्षा
इस बीच राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्रों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।
महागठबंधन से लेकर एनडीए तक, सब जनता की नब्ज टटोल रहे हैं —
किस मुद्दे पर वोट मिलेगा, कौन-सा वादा असरदार होगा,
कौन-सा नारा लोगों के दिल में जगह बना पाएगा।
पर सच्चाई यह है कि बिहार की जनता अब वादों से ज़्यादा विश्वास और ईमानदारी देखना चाहती है।
छठ पर्व की तरह सादगी, पारदर्शिता और समर्पण की भावना — यही आज मतदाता की भी अपेक्षा बन गई है।
बिहार की असली पहचान
बिहार की पहचान न तो जाति से है, न राजनीति से —
यहाँ की असली पहचान है आस्था और आत्मगौरव।
छठ यह बताता है कि बिहार बाँटने नहीं, जोड़ने की परंपरा रखता है।
और यही संदेश इस बार के चुनाव में भी गूंज रहा है —
“जाति नहीं, एकता की बात करो — बिहार को फिर महान बनाओ।”




