भिलाई। शिव शंकर शास्त्री की श्रद्धांजलि सभा में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से जुड़े 100 से अधिक वैदिक विद्वान भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्रित हुए। केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश से प्रोफेसर योगेंद्र कुमार और प्रोफेसर बृहस्पति मिश्र, हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय उत्तराखंड से डॉ विश्वेश, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार से डॉ वेदव्रत, अपेक्स विश्वविद्यालय जयपुर के कुलपति प्रोफेसर सोमदेव शतांशु, लखनऊ विश्वविद्यालय से डॉ सत्यकेतु, प्रयागराज स्थित इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डॉ विनोद कुमार, उस्मानिया विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से प्रोफेसर विद्यानंद, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से डॉ जगमोहन, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रोफेसर रामरतन खंडेलवाल, रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली के हिंदू कॉलेज, मुरादाबाद से प्रोफेसर कर्मवीर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से डॉ प्रशांत आत्रेय, गुरु गोविंददेव विश्वविद्यालय गोधरा गुजरात से डॉ भावप्रकाश गांधी तथा राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तिरुपति विद्यापीठ से डॉ यशस्वी ने अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। जनता वैदिक कॉलेज बड़ौत के प्राचार्य डॉ यशपाल तथा उत्तराखंड महाविद्यालय के प्रिंसिपल डॉ मुकेश ने भी दिवंगत विद्वान के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं।

स्वामी सुरेश्वरानन्द, दयानन्द शर्मा, आचार्य कृष्णदेव, आचार्य श्रीवत्स, आचार्य भारतीनन्दन, आचार्य पुरन्दर, आचार्य प्रेमप्रकाश, आचार्य सोमदत्त, आचार्य विद्यासागर, आचार्य अभयदेव, चैतन्य मुनि, कवींद्र, आचार्य भगवान देव, आचार्य बृहस्पति, अनेक गुरुकुलीय स्नातक, स्थानीय गणमान्य नागरिक, परिवारजन एवं अंतर्जाल पर जुड़े श्रद्धालुओं ने दिवंगत वैदिक विद्वान डॉ शिव शंकर शास्त्री को सामूहिक रूप से भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। पूज्य स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी महाराज ने उनके ज्ञान, सरलता और गुरु-परंपरा के प्रति समर्पण की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि शास्त्री जी का जीवन वैदिक संस्कृति की सेवा का उज्ज्वल उदाहरण था और विधि के विधान के समक्ष हम सभी नतमस्तक हैं।
डॉ अजय आर्य ने अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि ‘मुझे शिव शंकर शास्त्री से पढ़ने का सौभाग्य मिला था। वे अत्यंत सरल, मृदुभाषी और सारस्वत तेजस्विता से संपन्न थे। विद्वत्ता के शिखर पर होते हुए भी उनके व्यक्तित्व में कभी अहंकार की छाया तक नहीं दिखाई दी। यही उन्हें अन्य प्रतिष्ठित विद्वानों से विशिष्ट बनाता था।’ गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं वर्तमान में अपेक्स विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य सोमदेव शतांशु ने कहा कि ‘मेरे लिए यह अत्यंत निजी क्षति है। मेरे अनुजतुल्य शास्त्री जी नव प्रभात वैदिक विद्यापीठ की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।’ छत्तीसगढ़ प्रांतीय आर्य प्रतिनिधि सभा के महामंत्री अवनी भूषण पुरंग ने कहा कि ‘पांच वर्षों से निरंतर उनके संपर्क में रहा हूँ। वे सरल, जटिलताओं को सुलझाने वाले और सदैव कर्मनिष्ठ रहने वाले व्यक्तित्व थे।’
जनता वैदिक कॉलेज बड़ौत के प्राचार्य डॉ यशपाल आर्य ने श्रद्धांजलि देते हुए घोषणा की कि ‘डॉ शिव शंकर शास्त्री की अप्रकाशित रचनाओं को संकलित कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाएगा, ताकि उनका ज्ञान और कृतित्व जन-जन तक पहुंचे।’

संक्षिप्त परिचय – कौन थे शिव शंकर शास्त्री
शिव शंकर शास्त्री विश्व प्रसिद्ध गुरुकुल प्रभात आश्रम, मेरठ के यशस्वी स्नातक थे। व्याकरण शास्त्र पर उनका अद्वितीय अधिकार था और उन्होंने प्राचीन व्याकरण पर अपना पीएचडी पूर्ण किया था। वे केंद्रीय विद्यालय नया रायपुर से सेवानिवृत्त हुए और भिलाई के केंद्रीय विद्यालय में भी सेवाएँ दीं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने उड़ीसा के प्रभात विद्यापीठ में छात्रों को वेद, संस्कृत और वैदिक पाठ की शिक्षा देने में स्वयं को समर्पित कर दिया। संस्कृत गीत रचना में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने उड़िया और हिंदी के कई भजनों का संस्कृत रूपांतरण किया। उन्हें संपूर्ण यजुर्वेद सस्वर कंठस्थ था।
1 दिसंबर को प्रातः 6:00 बजे ट्रेन पकड़ते वक्त हाथ स्लिप हो जाने के कारण ट्रेन के नीचे फंस गए और उनकी मृत्यु हो गई। ट्रेन पकड़ने से आधे घंटे पूर्व भी गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को वेद पाठ का प्रशिक्षण दे रहे थे। उनकी स्मृति में आगामी गुरुवार 18 दिसंबर को महर्षि दयानंद सेवाश्रम, टाटीबंध रायपुर में शांति यज्ञ का आयोजन किया जाएगा।




