( मनीष बंछोर के फेसबुक वाल से )
छत्तीसगढ़ की माटी के बेटे और प्रदेश के जन-जन के चहेते नेता पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के परिवार ने पिछले 168 दिनों में जो सहा है… वह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि एक निर्दोष परिवार की भावनाओं की अग्निपरीक्षा थी। राजनीति जब द्वेष की पराकाष्ठा पर पहुंच जाए और अपने प्रतिद्वंद्वी को तोडऩे के लिए उसके मासूम बच्चों को ढाल बना ले, तो वह केवल सत्ता का अहंकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चेहरे पर एक गहरा दाग है।
चैतन्य बघेल, जिनका गुनाह सिर्फ इतना है कि वे उस पिता के पुत्र हैं जिसने छत्तीसगढिय़ा स्वाभिमान की लड़ाई को दिल्ली की सल्तनत और बड़े कॉरपोरेट घरानों की आँखों में आँखें डालकर लड़ा। राजनीति की विभीषिका से कोसों दूर, खेतों की मिट्टी में पसीना बहाने वाले एक विशुद्ध किसान चैतन्य को जेल की कालकोठरी में झोंक देना, उस पिता के मनोबल को तोडऩे की एक नाकाम कोशिश थी जो हमेशा अडानी जैसे पूंजीपतियों के खिलाफ गरीबों की ढाल बना रहा।

जरा सोचिए… उस पिता पर क्या गुजरी होगी जिसने दिन-रात छत्तीसगढ़ की सेवा की, लेकिन बदले में उसे अपने बेगुनाह बेटे की गिरफ्तारी देखनी पड़ी। सोचिए…. उस पिता की रातों की करवटें, जिसने अपनी पूरी उम्र जनता की सेवा में खपा दी, लेकिन षड्यंत्रकारियों ने बदले में उनके बेगुनाह बेटे को उनसे छीन लिया। 168 दिनों तक एक मां की सूनी आंखें और एक पिता का मौन संघर्ष, छत्तीसगढ़ की जनता ने बहुत करीब से देखा है। अब जब हाईकोर्ट ने चैतन्य की जमानत मंजूर की है, तो यह केवल एक कानूनी राहत नहीं है, बल्कि उस सच्चाई की गूँज है जिसे कुचलने की हर संभव कोशिश की गई थी।




