टीम खबर आलोक की ग्राउंड रिपोर्ट
छत्तीसगढ़… खनिज, हरियाली और आदिवासी संस्कृति की धरती।
लेकिन इसी धरती ने पिछले ढाई दशक में भारत का सबसे लंबा खून से भरा अध्याय देखा—नक्सलवाद।
हमारी टीम ने 2000 से 2025 तक की पूरी नक्सल गतिविधियों की जमीनी पड़ताल की।
जंगलों में रहने वाले ग्रामीणों से लेकर सुरक्षा एजेंसियों, पुलिस फाइलों, पूर्व नक्सलियों और विशेषज्ञों से बातचीत के बाद सामने आई यह सबसे सटीक और गहरी पड़ताल आज पहली बार आपके सामने है।
नक्सलवाद की जड़ें : 2000 के बाद कैसे फैला “लाल आतंक”
राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ के दक्षिणी हिस्से—दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा—नक्सलियों का गढ़ बन गए।
कम सड़कें, घने जंगल, सरकारी तंत्र की कम उपस्थिति और आदिवासी इलाकों की उपेक्षा ने नक्सलियों को विस्तार का अवसर दिया।
नक्सलियों ने “हक़ की लड़ाई” और “जंगल बचाओ” का नारा लगाकर लोगों का विश्वास जीता।
लेकिन यह आंदोलन धीरे-धीरे बंदूक, खून और फिरौती की फैक्ट्री बन चुका था।
सबसे बड़े नक्सली हमले, जिन्होंने पूरे देश को हिला दिया
- 2010 : ताड़मेटला नरसंहार — 76 जवान शहीद
- देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला।
जंगल के भीतर CRPF की टुकड़ी को घेरकर नक्सलियों ने गोलियों और IED से तबाह कर दिया। - 2013 : झीरम घाटी हमला — राजनीतिक नेतृत्व पर सबसे बर्बर वार
- छत्तीसगढ़ कांग्रेस का पूरा शीर्ष नेतृत्व एक हमले में खत्म।
इस घटना ने पूरे देश की राजनीति को झकझोर दिया। - 2021 : जोनागुड़ा हमला — 22 जवानों को शहादत
- 200 से ज्यादा नक्सलियों का घात लगाकर हमला—जल्दी मूवमेंट और गुरिल्ला रणनीति की सबसे बड़ी मिसाल।
- 2024–25 : लगातार ऑपरेशनों में बड़े नक्सली ढेर
DRG, STF, COBRA की संयुक्त कार्रवाई ने कई बड़े कमांडरों को खत्म किया।
इनमें सबसे बड़ा नाम था—
हिड़मा, जिस पर करोड़ों का इनाम था और जो 20 से अधिक बड़े हमलों का मास्टरमाइंड था।
मारे गए और गिरफ्तार किए गए प्रमुख नक्सली कमांडर
- हिड़मा — नक्सलियों की रीढ़ कहा जाने वाला कमांडर
- बसवराजु — टॉप लेवल रणनीतिकार
- देवा, मडकम आला, सोमडू — हिड़मा के दाएं हाथ
- इंगा, मंगला और कई दर्जन DVC सदस्य
इनकी मौत और गिरफ्तारी से नक्सलियों की ताकत टूटती चली गई।
नक्सली करते क्या हैं? जंगल के अंदर की जिंदगी—पहली बार विस्तार से
हमारी टीम को मिले इनसाइड इनपुट बताते हैं—
रोज सुबह 4 बजे कैंप बदलते हैं
पेड़ों की चोटियों से पुलिस मूवमेंट पर नजर
ग्रामीणों पर दबाव—“जंगल टैक्स”
नई भर्ती—कभी लालच देकर, कभी डर दिखाकर
हथियारों की मरम्मत और ट्रेनिंग
IED प्लांट करना और एम्बुश की तैयारी
हर शाम फिर नया ठिकाना
ये पूरी तरह कड़ी ट्रेनिंग, अनुशासन और छिपकर रहने की रणनीति पर चलते हैं।
आदिवासी क्यों जुड़े? लाइन जो नक्सलवाद को जिंदा रखती रही
हमारी जाँच में सामने आया—
- सरकारी सिस्टम से दूरी
सड़क, अस्पताल, स्कूल—कई जगह नाम के थे, काम के नहीं।
- आदिवासी बनाम व्यवस्था का ऐतिहासिक टकराव
शोषण, भ्रष्टाचार और लगातार अनदेखी ने नक्सलियों को “रक्षक” जैसा रूप दिया।
- जंगल से जीवन और पहचान
नक्सलियों ने ये नैरेटिव फैलाया—
“सरकार जंगल छीन लेगी, हम तुम्हारी रक्षा करेंगे।”
लेकिन अब तस्वीर बदल गई है — नक्सलवाद का अंत करीब?
2021 से 2025 के बीच छत्तीसगढ़ ने नक्सलवाद के खिलाफ इतिहास रचा—
50 से अधिक टॉप कमांडर खत्म
1000+ नक्सली सरेंडर
डीआरजी का जंगल के भीतर गहरा दबदबा
सड़कों, नेटवर्क और सुरक्षा कैंपों का तेजी से विस्तार
ग्रामीणों का नक्सलवाद से मोहभंग
जो इलाके कभी “रेड जोन” थे, वहाँ अब
- मंडी लग रही है
- बच्चे स्कूल जा रहे हैं
- महिलाएँ रोजगार समूह चला रही हैं
- पुल, सड़कें और नेटवर्क टॉवर खड़े हो चुके हैं
निष्कर्ष : 25 साल का सबसे बड़ा खुलासा—नक्सलवाद अब खत्म होने की कगार पर
छत्तीसगढ़ ने पिछले 25 सालों में खून, डर और खामोशी का नर्क झेला।
लेकिन आज तस्वीर बदली है—
लाल आतंक कमजोर है, सुरक्षा बल मजबूत हैं और जनता बदलाव के पक्ष में खड़ी है।
हमारी टीम की इस विशेष रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है—
छत्तीसगढ़ अब नक्सलवाद के अंत की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
