Thursday, January 15, 2026

ये जो चिलमन है दुश्मन है हमारी बनाम निजीकरण के साइड इफेक्ट

(वरिष्ठ पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन के फेसबुक वाल से)आनंद बख्शी जब हरनाम सिंह रवैल की फिल्म ‘महबूब की मेंहदी’ के लिए ये गीत लिख रहे होंगे, तब शायद ही उस दौर में मुंबई में आउटसोर्सिंग का इतना चलन रहा होगा।

आज जब भिलाई स्टील प्लांट अपनी नागरिक सेवाओं का निजीकरण तेजी से कर रहा है तो बहुत सी बातों पर चिलमन (परदा) पड़ा हुआ है। देखते हैं दिसंबर में जब टेंडर का लिफाफा खुलेगा तो किसके भाग खुलेंगे… लेकिन यह तय है कि इस आउटसोर्स का साइड इफेक्ट हम सबको भुगतना पड़ेगा। छोटे-छोटे उदाहरण से इसे इशारों में समझ लीजिए।

बीएसपी ने अपनी एक बंद पड़ी बिल्डिंग एक संस्थान को दी और साथ में बिजली-पानी मुफ्त भी…इसके उपर उसे साल में 2-3 करोड़ की वित्तीय सहायता भी हर साल जारी है। आज इस संस्थान की निजी कैटरिंग सर्विस धूम से चल रही है और बीएसपी के खंडहर भवन को इस संस्थान ने आलीशान महल बना लिया है। काम लगातार जारी है और यहां न निगम पूछ सकता है न बीएसपी के अफसर कि बिल्डिंग परमिशन कहां से मिल रही है..?

दूसरा, नमूना देखिए… कुछ दशक पहले बीएसपी ने अपना एक भवन आसपास की जमीन सहित महज एक रूपए में एक शैक्षणिक संस्थान को दिया। अभी हाल के बरसों में बीएसपी के ही एक प्रभावशाली अफसर को अपने बच्चे को वहां दाखिला दिलाना था, सीधे 7-8 लाख रूपए की मांग की गई। अफसर ने अपने दफ्तर आकर दस्तावेज खंगाले तो पता लगा बीएसपी मैनेजमेंट तो इस संस्थान में ट्रस्टी है।

बस फिर क्या था चाबी घूमी और उस बच्चे का बगैर जेब ढीली किए दाखिला हो गया। ये अलग बात है कि हाल ही में फिर उस संस्थान का मुद्दा उठा तो बिना किसी जानकारी के बीएसपी के अफसरों ने एक उच्च स्तरीय बैठक में कह दिया कि हम वहां ट्रस्टी नहीं है। हकीकत सब को पता है लेकिन अब बीएसपी मैनेजमेंट खुद जानबूझकर सब कुछ भूल कर निजी संस्थानों को लूट मचाने की खुली छूट दे रहा है।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है अभी हाल ही में मैं अपने एक परिजन को ट्रीटमेंट के लिए खाली पेट लेकर सेक्टर-9 अस्पताल गया था। डॉक्टर ने नाश्ता करवा कर लाने कहा। हम अस्पताल के कॉफी हाउस चले गए। वहां वेटर ने कान में आकर धीरे से पूछा बीएसपी या नॉन बीएसपी…?
मुझे समझ नहीं क्यों पूछ रहा है, फिर भी मैनें बता दिया नॉन बीएसपी। इसके बाद हम लोगों ने जो भी खाया पिया, उसका बिल यहां पेशे खिदमत है। मसाला डोसा मुझे 150 रूपए का पड़ा।
पूरे भिलाई में पता नहीं और कहां-कहां 150 रूपए का डोसा मिलता है। इस बिल का भुगतान करते हुए मेरे साथ आए मरीज से ज्यादा दर्द मुझे हुआ। यहां यह भी जान लीजिए कि कॉफी हाउस के कर्मचारियों की तनख्वाह बीएसपी देता है और हाउस कीपिंग के लिए अलग से वित्तीय सहायता भी देता है।

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी लेकिन आज इतना ही समझ लीजिए। यहां ब्लैक एंड वाइट तस्वीर 26 फरवरी 1961 की है, जब तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) के उपप्रधानमंत्री अलेक्सेई कोसिजिन (हैट पकड़े हुए) भिलाई आए थे और मरोदा गांव की खाली होती जमीन पर एक पौधा लगाया था।
इसे भारत-सोवियत मैत्री का प्रतीक माना गया और इसी के इर्द-गिर्द मैत्री बाग की शुरूआत की गई थी। यह जगह आज मैत्री बाग के अंदर चिड़ियाघर के ठीक बाजू बाईं ओर है। कोसिजिन का लगाया पौधा वटवृक्ष बन चुका है।

वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन और बीएसपी मैनेजमेंट की जो बातचीत का ब्यौरा सार्वजनिक किया गया है, उसके मुताबिक मैत्रीबाग का संचालन राज्य शासन को सौंपने पर सहमति बनी है। लेकिन ठहरिए, इससे यह मत सोचिए कि छत्तीसगढ़ शासन कोई नियमित वेकेंसी निकालकर यहां सरकारी कर्मचारी, डॉक्टर और अफसर रखेगा।
इसका भी हश्र कॉफी हाउस के ‘150 रूपए के डोसे’ जैसा होना है। यह तय है कि यहां संचालन में नाम भले ही राज्य शासन का होगा लेकिन यहां की सेवाएं अंतत: आउटसोर्स ही की जाएगी।
उसके बाद आप यहां अंदर जाने 200 रूपए दीजिएगा और चिड़िया घर देखने के लिए शायद 500, फिर म्यूजिकल फाउंटेन की टिकट कटाना हो तो 300 या 400 वहां भी…बस। अब तक सहज होकर हम भिलाईवासी जिन नागरिक सुविधाओं का इस्तेमाल थोड़े बहुत भुगतान के बाद कर लेते थे, अब उस पर हमारा हक नहीं रहेगा।

इतनी तमाम बातों के बावजूद आउटसोर्स को कोई नहीं रोक सकता, यह अटल सत्य है। लेकिन, वक्त रहते अगर हमारे जनप्रतिनिधि और सेल-बीएसपी मैनेजमेंट के अफसर दिल्ली से राजनीतिक प्रभाव लेकर आने वाली कंपनी के साथ नियम-शर्तों में जनभावना का पूरी सख्ती के साथ ध्यान रख लें तो बेहतर होगा।
पर यहां तो परदेदारी ज्यादा है। इसलिए दाग देहलवी कह गए हैं- ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं, साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं…

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