संदीप सिंह पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नई सियासी पटकथा लिखी जा रही है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा की ओर बढ़े Nitish Kumar के फैसले के बाद सत्ता के गलियारों में भाजपा और जदयू के बीच एक बड़ी राजनीतिक ‘डील’ की चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सत्ता का संतुलित हस्तांतरण, नई पीढ़ी का उदय और गठबंधन की नई रणनीति छिपी हुई है।
सूत्रों के अनुसार इस कथित समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बिहार में पहली बार भारतीय जनता पार्टी का अपना मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता साफ किया गया है। पिछले कई वर्षों से भाजपा जदयू के साथ गठबंधन में सत्ता में तो रही, लेकिन मुख्यमंत्री पद हमेशा जदयू के पास ही रहा। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के अधिक सीटें जीतने के बाद से ही यह चर्चा चल रही थी कि पार्टी अब राज्य की राजनीति में ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाना चाहती है। ऐसे में नीतीश कुमार का इस्तीफा भाजपा के लिए उस राजनीतिक लक्ष्य की दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की संभावित राजनीतिक एंट्री को लेकर है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह समझौता केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि जदयू के भविष्य की राजनीति भी इसी के साथ तय की जा रही है। माना जा रहा है कि निशांत कुमार को जल्द ही सक्रिय राजनीति में लाया जा सकता है। उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने या जदयू की संगठनात्मक कमान सौंपने जैसे विकल्पों पर भी चर्चा बताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो यह जदयू के नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव की शुरुआत होगी।
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने को भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। उन्होंने स्वयं कई बार यह इच्छा जताई थी कि वे देश की राजनीति के सभी प्रमुख सदनों—विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा—का सदस्य बनने का एक अनोखा राजनीतिक रिकॉर्ड पूरा करना चाहते हैं। 5 मार्च 2026 को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के साथ ही यह सपना लगभग पूरा होने की दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसे उनकी सक्रिय राज्य राजनीति से ‘सम्मानजनक विदाई’ के रूप में भी देख रहे हैं।
इस फैसले के पीछे स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं की भी चर्चा है। 75 वर्षीय नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर पिछले कुछ समय से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने उन्हें केंद्र की राजनीति में मार्गदर्शक की भूमिका निभाने और बिहार की सत्ता नई पीढ़ी को सौंपने के लिए सहमत किया—ऐसी बातें राजनीतिक हलकों में कही जा रही हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जदयू के भविष्य को लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में जदयू और भाजपा के रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं। यहां तक कि यह भी चर्चा है कि भविष्य में जदयू का भाजपा में विलय या दोनों दलों के बीच और गहरा राजनीतिक तालमेल देखने को मिल सकता है।
हालांकि इन सभी चर्चाओं के बीच नीतीश कुमार ने सार्वजनिक तौर पर इतना ही कहा है कि नई सरकार को उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहेगा। लेकिन बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि यह घटनाक्रम केवल एक इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की सत्ता, नेतृत्व और गठबंधन राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत भी हो सकता है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह ‘डील’ केवल चर्चा भर थी या वास्तव में बिहार की राजनीति का नया अध्याय लिखने वाली रणनीति।




