पीएम केंद्रीय विद्यालय, दुर्ग जनजाति पखवाड़ा दिवस का समापन महोत्सव

मां ने कहा था शेर का शिकार करना बड़ी बात नहीं है हिम्मत वाले हो तो अंग्रेजों से लड़ो

दुर्ग। पीएम केंद्रीय विद्यालय दुर्ग में आज जनजाति पखवाड़ा दिवस बड़े उत्साह और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि के रूप में राजीव गांधी नेशनल अवार्ड प्राप्त, वैशाली नगर कॉलेज की समाजशास्त्र विभाग की प्रतिष्ठित प्रोफेसर डॉ. चांदनी मरकाम ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम को गौरवान्वित किया। विद्यालय के प्राचार्य उमाशंकर मिश्रा एवं उपप्राचार्या पुष्पबड़ा ने पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका हार्दिक स्वागत किया। इस अवसर पर आदिवासी संस्कृति पर आधारित चित्र प्रदर्शनी का आयोजन रचना पाल के नेतृत्व में किया गया।

आदिवासी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति निशा, खुशी, वैभवी, अनिका, हुमेंद्र, भाविका, डॉलीशा, गुनीता, सोनिया एवं शिवानी की टीम द्वारा डॉ. श्रावणी सिंह के मार्गदर्शन में की गई, जिसने कार्यक्रम की सांस्कृतिक छटा को और समृद्ध कर दिया।

प्रारंभिक उद्बोधन में प्राचार्य उमाशंकर मिश्रा ने कहा कि “आदिवासी संस्कृति हमें प्रकृति से संतुलन, धैर्य, सामूहिकता और सरलता का जीवन जीना सिखाती है। हम स्वयं को भले ही आधुनिक और विकसित समझ लें, लेकिन प्रकृति की उपासना करने वाला जनजातीय समाज जीवन मूल्यों के स्तर पर कहीं अधिक समृद्ध है। भारत की लगभग 8.6% आबादी जनजातीय समुदायों से आती है। हमें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर इनकी संस्कृति, संघर्ष और सभ्यता को समझना चाहिए। यही समझ हमें बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में प्रेरित करती है।

उन्होंने आगे कहा कि जनजाति पखवाड़ा अपने इतिहास, विरासत और सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ने का महत्त्वपूर्ण अवसर है और विद्यालय सदैव इस दिशा में सार्थक पहल करता रहेगा।
कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अजय आर्य ने किया। उन्होंने भंगार देवी मेले का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मेले में “देवताओं की पेशी” लगती है, जहां 240 गांवों के लोग अपने देव-देवियों को लेकर उपस्थित होते हैं। यह आस्था और विश्वास अपने आप में अनोखा संदेश देता है कि समाज में नेतृत्व करने वाले लोग यदि नियम-कानून से ऊपर होने की भूल करते हैं, तो जनता उन्हें ‘कटघरे’ में खड़ा करना भी जानती है।

उन्होंने बताया कि आदिवासियों का संघर्ष भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से भी पुराना है। “हमें 1857 पढ़ाया जाता है, जबकि 1770 से ही आदिवासी अंग्रेजों से संघर्ष कर रहे थे। 1852 में सरगुजा की क्रांति हुई, हूल क्रांति ने बड़ा रूप लिया, लेकिन इन अध्यायों को इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिला। मुख्य अतिथि राजीव गांधी राष्ट्रीय वार्ड से सम्मानित विषय विशेषज्ञ प्रोफेसर चांदनी मरकाम ने अपने प्रभावशाली भाषण में कहा कि आदिवासी संस्कृति कम साधनों में संतोषपूर्वक जीवन जीने और प्रकृति की पूजा करना सिखाती है। उन्होंने चेंदरू मंडावी ‘द टाइगर बॉय’ का उदाहरण देते हुए बताया कि जनजातीय समाज की बाल चेतना भी प्रकृति और संवेदना से जुड़ी होती है। चेंदरू ने शेर को अपना दोस्त बना लिया था।

उन्होंने तात्या भील का उल्लेख करते हुए कहा कि जब तात्या भील ने शेर का शिकार किया, तब उनकी मां ने उनसे कहा था-
शेर का शिकार करना बहुत बड़ी बात नहीं है; यदि सच में हिम्मत है तो अंग्रेजों से लड़ो। यही सीख आगे चलकर क्रांति का बीज बनी। तात्या भील, उनके दो भाई और तीन बहनें स्वतंत्रता संघर्ष में वीरगति को प्राप्त हुए। अनेक गांव अंग्रेजों के दमन से उजाड़ दिए गए, परंतु इतिहास में इन बलिदानों को आज भी वाजिब स्थान नहीं मिला है।

समापन अवसर पर दीवार पेंटिंग, चित्रकला प्रदर्शनी, आदिवासी भोजन, पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य सहित कई गतिविधियों का आयोजन किया गया, जिनसे छात्र-छात्राओं को आदिवासी संस्कृति की जड़ों और मूल्यों से परिचित होने का अवसर मिला। कार्यक्रम जनजातीय संस्कृति, संघर्ष और गौरवमयी विरासत को समझने की एक सार्थक और प्रेरणादायक पहल साबित हुआ।

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