रेवड़ी नहीं, रोज़गार की राह..

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संदर्भ….सुप्रीम कोर्ट की चिंता

— आलोक तिवारी
देश की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां लोकलुभावन वादे और दीर्घकालिक विकास आमने-सामने दिखते हैं। मुफ्त बिजली, पानी, नकद सहायता, यात्रा, गैस—सूची लंबी है। चुनावी मंचों से घोषणाएं होती हैं, तालियां बजती हैं, और मतदाता के मन में तात्कालिक राहत की उम्मीद जगती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राहत स्थायी समाधान है?
मुफ्त योजनाओं पर सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने समय-समय पर चिंता जताई है कि राजकोषीय अनुशासन और विकास की प्राथमिकताएं कहीं पीछे न छूट जाएं। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाएं कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी हैं, परंतु बिना वित्तीय आकलन के अंधाधुंध घोषणाएं भविष्य की अर्थव्यवस्था पर बोझ बन सकती हैं।

यह बहस केवल ‘रेवड़ी’ बनाम ‘रोजगार’ की नहीं है, बल्कि राजनीतिक संस्कृति की है। जब सरकारें स्थायी उद्योग, कौशल विकास और रोजगार सृजन की बजाय तात्कालिक नकद हस्तांतरण पर अधिक जोर देती हैं, तो समाज में आत्मनिर्भरता की भावना कमजोर पड़ने का खतरा रहता है। लोकतंत्र में मतदाता सम्मान चाहता है—खैरात नहीं, अवसर।

दूसरी ओर, यह भी सच है कि देश के बड़े हिस्से में गरीबी, बेरोजगारी और असमानता अब भी चुनौती हैं। ऐसे में लक्षित सामाजिक सहायता योजनाओं की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। समस्या तब खड़ी होती है जब चुनावी मौसम में घोषणाओं की बाढ़ आ जाती है और वित्तीय स्रोतों का स्पष्ट खाका सामने नहीं आता।
राज्य पहले से ही राजस्व घाटे से जूझ रहे हैं। कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। यदि बजट का बड़ा हिस्सा अल्पकालिक योजनाओं में चला जाएगा, तो बुनियादी ढांचे—सड़क, उद्योग, शिक्षा संस्थान, अस्पताल—पर निवेश कैसे बढ़ेगा? और यदि निवेश नहीं बढ़ेगा, तो रोजगार के अवसर कहां से आएंगे।

लोकतंत्र की परिपक्वता का अर्थ है—लोकप्रिय निर्णय और उत्तरदायी निर्णय के बीच संतुलन। घोषणापत्र केवल वादों की सूची नहीं, बल्कि वित्तीय जवाबदेही का दस्तावेज होना चाहिए। राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि योजनाओं के लिए संसाधन कहां से आएंगे और उनका दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा।
आज देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो युवाओं को मुफ्त की बैसाखी नहीं, बल्कि स्वावलंबन का मंच दे। रोजगार सृजन, कौशल विकास और उद्यमिता को प्राथमिकता देकर ही आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा साकार हो सकती है।

अंततः, सवाल मुफ्त देने या न देने का नहीं है। सवाल है—क्या हम भविष्य के भारत को कर्ज और निर्भरता की राह पर ले जाएंगे, या अवसर और उत्पादन की दिशा में?
राजनीति को यह तय करना होगा कि उसे ताली चाहिए या परिवर्तन।
(लेखक: आलोक तिवारी, प्रधान संपादक खबर आलोक और सांध्य दैनिक नई दृष्टिबिंदु )

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