Thursday, January 15, 2026

इसी साल अप्रैल की बात है..सिर्फ यादें रह गईं…

अब जाकर मिले ‘असली’ वाले विनोद कुमार शुक्ल

(वरिष्ठ पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन जी के फेसबुक वाल से)अपने छत्तीसगढ़ से प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ सम्मान के लिए वयोवृद्ध कवि-साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल के नाम की घोषणा हुई है। समूचे छत्तीसगढ़ से यह पहला अवसर है, जब अपने यहां के साहित्यकार को ज्ञानपीठ दिया जाएगा। यह सम्मान आने वाले दिनों में यहीं रायपुर में उनके शैलेंद्र नगर वाले घर पर ही देने की तैयारी है।

हाल में जब से घोषणा हुई है, तब से उनके घर में लोगों की आमदरफ्त बढ़ गई है। ऐसे में खुद परिवार के सामने दुविधा है कि किसे कब आने समय दें। उनके बेटे शाश्वत गोपाल शुक्ल की भी जवाबदारी कुछ और बढ़ गई है। खैर, इन सारी उहापोह के बीच एक दिन मुझे भी ब ज़रिए शाश्वत उनके शैलेंद्र नगर वाले घर पर हाजिरी देने वक्त मिल गया।
यहां मैं बता दूं कि कोई दो दशक पहले शाश्वत भी पत्रकारिता कर रहे थे और ‘हरिभूमि’ में थे। तो अब मुद्दे की बात पर आ जाते हैं। मैनें जो ‘असली’ वाले विनोद कुमार शुक्ल लिखा है, वह वाकई में 16 आना सच बात है। यकीन न हो तो आप लोग शाश्वत से तस्दीक करवा सकते हैं। मेरी इस छोटी सी याद में आपको एक गंभीर कवि विनोद कुमार शुक्ल का ‘विनोद’ देखने मिलेगा।

दरअसल, हुआ कुछ यूं कि दो दशक पहले शाश्वत और मैं प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) की परीक्षा देने बाम्बे पहुंचे थे। सुबह 8 बजे से लिखित परीक्षा होनी थी, लिहाजा मैं करीब आधा घंटा पहले वहां पहुंचा। थोड़ी देर बाद शाश्वत अपने पिता के साथ पहुंचे।
तब तक छत्तीसगढ़ में एक जैसे नाम वाले दो साहित्यकारों की वजह से थोड़ा कन्फ्यूजन रहता था। एक विनोद कुमार शुक्ल और दूसरे (अब दिवंगत हो चुके) विनोद शंकर शुक्ल। तो असली कहानी अब यहां से शुरू होती है।

मैं दोनों पिता-पुत्र के पास पहुंचा और मेरे अभिवादन के बाद शाश्वत ने मेरा परिचय करवाया। इस पर पता नहीं शुक्ल जी को क्या सूझी, उन्होंने गंभीरता से पूछा-मुझे पहचानते हो, क्या..? अचानक आए इस सवाल से मैं भी हड़बड़ा गया और मैनें कहा-हां आप विनोद कुमार शुक्ल जी हैं?
इस पर उन्होंने चेहरे का भाव बदले बगैर गंभीरता से कहा, नहीं, किसने कहा तुम्हे। मन में लगा कि इनका नाम विनोद शंकर शुक्ल तो नहीं है। शुक्ल जी के चेहरे पर गंभीरता थी, लिहाजा मुझे और ज्यादा कन्फ्यूजन होने लगा।

मैनें फिर कहा-हां, आप वही ‘नौकर की कमीज’ वाले विनोद कुमार शुक्ल हैं। इस पर फिर उन्होंने पलट कर कहा-अरे, नहीं भाई मैं वो नहीं हूं, आपको किसी ने गलत पहचान बता दी है।
इससे मैं कुछ और परेशान हुआ। सामने शुक्ल जी भी वक्त काटने के लिहाज से मामले को लंबा खींचने वैसे ही गंभीरता ओढ़े रहे। मैनें फिर कहा- तो आप विनोद शंकर शुक्ल जी हैं? फिर उन्होंने कहा-नहीं भाई, मैं विनोद शंकर शुक्ल भी नहीं हूं। इससे जहां मैं परेशान हो रहा था, वहीं शाश्वत के सामने सिवाए पिता के समर्थन में गंभीरता लादे रहने के कोई चारा नहीं था।
एक मरतबा तो शाश्वत ने भी कह दिया-आप गलत पहचान बता रहे हो। खैर, पूरे 10 मिनट तक यही चलता रहा। उस वक्त स्मार्ट फोन का दौर नहीं था कि गूगल से पूछता स्क्रीन पर असली विनोद कुमार शुक्ल की तस्वीर आ जाती।

ऐसे में जैसे ही परीक्षा हॉल की घंटी बजी, हम लोगों को अंदर जाना पड़ा। लेकिन आखिर तक पूरी गंभीरता के साथ विनोद कुमार शुक्ल यही कहते रहे-नही भई मैं वो नहीं हूं। इसके बाद हम लोग परीक्षा देने अंदर चले गए। जब तीन घंटे बाद बाहर निकले तो फिर मेरे सामने वही सवाल था लेकिन इस बार मैनें कुछ पूछा नहीं। बस, इस बार हम सब मुस्कुराते हुए अपने-अपने रास्ते आगे बढ़ लिए।
बाद में भिलाई पहुंचने पर मैनें सबसे पहला काम किया अपने एक परिचित के घर जाकर ‘नौकर की कमीज’ किताब निकलवाई और उसमें लेखक की फोटो देख कर तसल्ली की कि, हां मैनें बिल्कुल सहीं पहचाना था।

तब उस रोज बॉम्बे में सुबह-सुबह विनोद कुमार शुक्ल कुछ मजाक के मूड थे, लिहाजा उन्होंने पूरी गंभीरता के साथ आखिर तक अपनी शिनाख्त को जाहिर नहीं होने दिया था।
अब करीब 20 साल बाद उनसे मिलने जब मैं घर गया तो हमारे दौर के इस सबसे बड़े साहित्यकार पर उम्र हावी है। जाहिर सी बात है 88 बरस की उम्र में उन्हें अब बहुत ज्यादा याद नहीं रहता और उनसे बात करना हो तो बेहद करीब जाकर रुक-रुक कर कहना होता है।

तो, इस बार मिलने पर तमाम बातों के अलावा मैनें उन्हें बॉम्बे वाला वाकया याद दिलाया तो पास बैठे शाश्वत ने और अच्छे ढंग से उन्हें बता दिया। इसके बाद विनोद कुमार शुक्ल मंद-मंद मुस्कुराते रहे।
फिर कुछ देर अनौपचारिक बात कर मुझे विदा लेनी पड़ी। क्योंकि मेरे बाद दो और प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने आ रहा था। अपने दौर के इस बड़े साहित्यकार से हुई छोटी-छोटी बातचीत आगे करने की कोशिश रहेगी। फोटो हाल की है, जिसमें आप शाश्वत को भी देख सकते हैं।

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