प्रचार के बीच बवाल, गोलीबारी में जनसुराज कार्यकर्ता दुलारचंद यादव की मौत — सवाल उठे: संवेदनशील सीट पर प्रशासन कहाँ था?
“मोकामा बना बारूद का मैदान, चुनावी जोश में उठा खून का तूफ़ान”
बिहार विधानसभा चुनाव के बीच गुरुवार की रात मोकामा में बम-बारूद जैसी स्थिति बन गई।
एनडीए प्रत्याशी अनंत सिंह और जनसुराज उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के समर्थकों में हिंसक भिड़ंत हो गई।
लाठी-डंडे, ईंट-पत्थर और गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका दहल उठा।
इस फायरिंग में जनसुराज समर्थक दुलारचंद यादव की मौत हो गई, जबकि कई घायल बताए जा रहे हैं।
भदौर और घोसवरी के बीच का इलाका रातभर थाने और एंबुलेंस की सायरन से गूंजता रहा।
कैसे भड़की हिंसा? — काफिलों की टक्कर बनी तबाही की वजह
सूत्रों के मुताबिक, रात करीब 9 बजे दोनों प्रत्याशियों के काफिले प्रचार के दौरान आमने-सामने आ गए।
पहले नारेबाज़ी, फिर धक्का-मुक्की और उसके बाद गोलियाँ चलीं।
चश्मदीदों का कहना है कि “पहले बहस हुई, फिर किसी ने फायर कर दिया — और सब कुछ आग में बदल गया।”
स्थानीय दुकानों के शीशे टूटे, कई बाइकें जलीं, और सड़क पर पसरा खून गवाही दे रहा था कि
मोकामा की राजनीति सिर्फ नारों में नहीं, अब गोलियों में उतर आई है।

राजनीतिक रंजिश ने बढ़ाई आग — वर्षों पुरानी दुश्मनी फिर जिंदा!
मोकामा की जमीन पर अनंत सिंह और सूरजभान परिवार की राजनीतिक खींचतान किसी से छिपी नहीं।
वर्षों पुरानी यह दुश्मनी अब नई चुनावी शक्ल में लौट आई है।
जनसुराज के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि हमला सुनियोजित था —
“हम प्रचार कर रहे थे, तभी एनडीए के गुंडों ने घेर लिया और गोलियाँ चला दीं।”
वहीं अनंत सिंह समर्थक उलटा आरोप लगा रहे हैं कि “पहले हमला पीयूष के लोगों ने किया।”
प्रशासन की नींद टूटी गोलियों की आवाज़ से! — चुनाव आयोग पर भी उठे सवाल
घटना के बाद इलाके में पुलिस और बीएसएपी की भारी तैनाती की गई है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही — जब मोकामा पहले से “संवेदनशील सीट” घोषित थी,
तो प्रशासन ने पहले सुरक्षा क्यों नहीं बढ़ाई?
क्या चुनाव आयोग की निष्पक्षता सिर्फ कागज़ों में रह गई है?
जनसुराज प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी का आरोप —
“हमें पहले से धमकियाँ मिल रही थीं, लेकिन किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई।
आज एक निर्दोष की जान चली गई। इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग और प्रशासन दोनों की है।”
खबर आलोक की पड़ताल — सियासत में कानून व्यवस्था फिर बेबस!
खबर आलोक की टीम ने जब मौके पर हालात देखे,
तो गांवों में खौफ और आक्रोश दोनों दिखाई दिए।
लोगों का कहना है कि “जब नेता ही बंदूक उठा लें तो आम आदमी कहाँ जाए?”
इलाके में तनाव बरकरार है, और अगले 48 घंटे बेहद नाज़ुक बताए जा रहे हैं।
मोकामा की सीट अब सिर्फ चुनाव नहीं — इज्जत और असर की लड़ाई बन चुकी है
एक ओर अनंत सिंह की पुरानी पकड़, दूसरी ओर जनसुराज की नई लहर…
अब यह लड़ाई वोटों से ज़्यादा “वर्चस्व” की हो चली है।
अगर प्रशासन ने हालात काबू में नहीं लिए,
तो मोकामा किसी भी वक्त फिर जल सकता है।
रिपोर्टर: संदीप सिंह, स्पेशल रिपोर्टिंग टीम – खबर आलोक
लोकेशन: मोकामा, पटना
अपडेट: शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025, रात 11:00 बजे तक