सलाखों के पीछे से सफलता की उड़ान: आजीवन कारावास भुगत रहे बंदी ने 12वीं प्रथम श्रेणी में की पास

अंग्रेजी में डिस्टिंक्शन, अब शिक्षक बनकर बच्चों को पढ़ाने का संकल्प
केंद्रीय जेल दुर्ग में 103 बंदियों ने पास की पहली से एमए तक की परीक्षा

दुर्ग: केंद्रीय जेल दुर्ग में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक बंदी ने शिक्षा की ताकत से नई मिसाल कायम की है। सुपेला, भिलाई निवासी इस बंदी ने जेल में रहकर 12वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है। अंग्रेजी विषय में डिस्टिंक्शन हासिल कर उसने यह साबित कर दिया कि हालात कैसे भी हों, लगन हो तो सफलता मिलती है।

2018 से काट रहा था सजा
यह बंदी वर्ष 2018 से भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा था। जेल आने से पहले वह अशिक्षित था। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग के मार्गदर्शन और जेल प्रशासन की पाठशाला में उसने पढ़ाई शुरू की। सीमित संसाधनों के बीच कक्षा पहली से 12वीं तक का सफर तय किया।

शिक्षक बनने का संकल्प
सजा पूरी कर जेल से बाहर आने के बाद बंदी ने समाज की मुख्यधारा में सम्मान से जीने की इच्छा जताई है। उसने शिक्षक बनकर बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया है। यह उपलब्धि आत्मपरिवर्तन और पुनर्वास की दिशा में बड़ा कदम है।

जेल में 103 बंदी हुए पास
केंद्रीय जेल दुर्ग में शैक्षणिक सत्र 2025-26 में महिला और पुरुष बंदियों ने कक्षा पहली से एमए अंतिम वर्ष तक की परीक्षा दी। कुल 103 बंदियों ने सफलता हासिल की। यह जेल परिसर में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है।

जेल प्रशासन की अहम भूमिका
इस सफलता में केंद्रीय जेल दुर्ग के जेल अधीक्षक, जेल प्रशासन और पाठशाला के शिक्षकों की अहम भूमिका रही। उनके प्रयासों से बंदियों को न सिर्फ शिक्षा का मौका मिला, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद भी जगी।

यह कहानी बताती है कि अपराध व्यक्ति की पहचान नहीं होता। शिक्षा, संस्कार और सकारात्मक अवसर किसी भी जीवन को नई पहचान दे सकते हैं। केंद्रीय जेल दुर्ग में शिक्षा के जरिए हो रहा यह बदलाव सुधारात्मक न्याय व्यवस्था की सार्थकता का जीवंत उदाहरण है।

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