अज्ञान अंधेरा है और ज्ञान प्रकाश: आचार्य डॉ. अजय आर्य
भिलाई – दुर्ग। आर्य समाज वैदिक सत्संग समिति, पतंजलि योग समिति और भारत स्वाभिमान परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आर्य समाज के संस्थापक, महान समाज सुधारक और वेदों के पुनर्जागरणकर्ता महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती का बलिदान दिवस दीपावली मिलन के साथ श्रद्धा एवं संकल्प के भाव से मनाया गया। उल्लेखनीय है कि कार्तिक अमावस्या 1883 ईस्वी को महर्षि दयानंद ने अपनी इहलीला समाप्त की थी। कार्यक्रम के प्रारंभ में वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ अग्निहोत्र यज्ञ हुआ-जहाँ वातावरण वेदध्वनि से गूंज उठा और प्रतीत हुआ मानो ऋषि की ज्योति आज भी मानवता के मार्ग को आलोकित कर रही हो।
मुख्य वक्ता के रूप में गुरुकुल प्रभात आश्रम मेरठ के स्नातक आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। लोग वेदों को मानते हैं, पर जानते नहीं हैं। स्वामी दयानंद ने ‘वेदों की ओर लौटो’ का जो आह्वान किया-उसी में अंधकार से प्रकाश की यात्रा का मार्ग छिपा है। उन्होंने कहा कि ऋषि के जीवन में ‘दया’ और ‘आनंद’ दो दिव्य भाव थे। यदि मनुष्य इन दोनों को अपने भीतर जगा ले तो यह जगत स्वयं प्रकाशित हो जाएगा। आचार्य आर्य ने यज्ञ को वैज्ञानिक दृष्टि से समझाते हुए कहा कि शुद्ध वायु, शुद्ध विचार और शुद्ध समाज के लिए यज्ञ आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि जीवन को बदलने के लिए केवल ज्ञान ही नहीं, ध्यान और आत्मचिंतन भी उतना ही जरूरी है। संस्कृत ग्रंथ कादंबरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा-यौवन, धन, अधिकार और विवेक में से कोई भी यदि नियंत्रण से बाहर हो जाए तो मनुष्य विनाश की ओर बढ़ता है। स्वामी दयानंद ने इसी विवेक की ज्योति जगाई थी। उन्होंने कहा- आप अपने लिए स्वतंत्र हैं किंतु जब आप समाज में हैं तो सार्वजनिक हित के लिए परतंत्र हैं -यही ऋषि दयानंद का अद्भुत जीवन दर्शन है। उन्होंने न केवल अंधविश्वास का विरोध किया बल्कि यह भी सिखाया कि सबके प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखो। सत्य और ज्ञान का प्रकाश ही सच्चा प्रकाश है।
कार्यक्रम का संचालन पं. राकेश दुबे ने किया। उन्होंने कहा-“दीपावली पर हर कोई बाहर रोशनी करता है, पर भीतर के अंधेरे को मिटाना भूल जाता है। स्वामी दयानंद ने सिखाया कि असली दीपक वह है जो अपने भीतर से प्रकाश फैलाए।” उन्होंने हल्के व्यंग्य में कहा-आज जो दिवाली हम मना रहे हैं इसमें से राम गायब हो रहे हैं। दीपावली व्यापार का त्योहार बन रही है ऑफर मॉल मौज मस्ती और तमाशा का त्योहार बन गया। स्वामी दयानंद का संदेश है कि प्रतिपल जीवन को पवित्र बनाने की कोशिश करनी चाहिए। ऋषि दयानंद के दीप से ही समाज के दीप जलते जा रहे हैं।

कार्यक्रम में विशेष सहयोग पं. राकेश दुबे, चतुर्भुज अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, मुकेश जैन, लोकेश्वर साहू, किरण साहू, देवेश कुमार साहू, संजय अग्रवाल, शिवन गुप्ता, संजय शुक्ला, सीमा श्रीवास्तव, रौनक श्रीवास्तव, रवि, गायत्री, अमिताभ दुबे और शिवन गुप्ता का रहा।
पतंजलि योग समिति के नवीन यदु और रवि ने कहा कि जीवन में जो भी सकारात्मक परिवर्तन आया है-उसका श्रेय ऋषि दयानंद की प्रेरणा को जाता है। चतुर्भुज अग्रवाल ने घोषणा की कि समाज में वैदिक चेतना जगाने हेतु प्रति माह एकादश कुंडी महायज्ञ का आयोजन किया जाएगा। धन्यवाद ज्ञापन राजेंद्र अग्रवाल ने किया। उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश और संस्कार विधि जैसे ग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहा कि डॉ. अजय आर्य के विचार केवल सुनने के लिए नहीं बल्कि जीवन में उतारने योग्य हैं।
दीपावली का छोटा-सा दीप हमें जीवन का बड़ा दर्शन सिखाता है। एक दीप जब अपनी ज्योति से दूसरे दीप को जलाता है तभी उसका अस्तित्व सार्थक होता है। स्वामी दयानंद का जीवन भी ऐसा ही दीप था-जिसने अपने प्रकाश से अनगिनत आत्माओं को जाग्रत किया। आज जब समाज फिर से भ्रम, भोग और विभाजन के अंधकार में भटक रहा है-तब ऋषि दयानंद की ज्योति हमें याद दिलाती है कि अंधकार को कोसने से बेहतर है कि एक दीप जलाया जाए।
शांति पाठ और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। अंत में एक ही भाव सबके मन में गूंजता रहा-“दीप केवल जलाने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की दिशा है।”




