दुर्ग।
छत्तीसगढ़ की पावन भूमि दुर्ग के नागपुरा में आयोजित प्रसिद्ध कथावाचक पं. प्रदीप मिश्रा की शिव कथा ने श्रद्धा, भक्ति और आत्मिक शांति का अनुपम संगम रच दिया। यह पवित्र आयोजन तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित रहा, जहाँ मानव जीवन को परमात्मा की ओर अग्रसर करने वाली शिवभक्ति का गूढ़ संदेश जन-जन तक पहुँचा।

शिव कथा के दौरान पं. प्रदीप मिश्रा ने कहा कि मानव जीवन का परम लक्ष्य ईश्वर की शरण में जाना है। भगवान शिव किस रूप में, किस समय और कहाँ दर्शन देंगे—यह केवल वही जानते हैं। भक्त का कर्तव्य है कि वह निष्काम भाव से, पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ भक्ति करे। जब भक्ति सच्चे मन से की जाती है, तब महादेव स्वयं भक्त के जीवन में प्रवेश कर उसके कष्ट हर लेते हैं।
नागपुरा की यह पावन धरती, जहाँ तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की स्मृति समाहित है, शिवभक्ति के रंग में सराबोर हो उठी। कथा पंडाल में “हर-हर महादेव” के जयकारों से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। श्रद्धालुओं ने अनुभव किया कि शिव कथा केवल कथा नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का मार्ग है—जो मनुष्य को लोभ, मोह और अहंकार से ऊपर उठाकर परमात्मा के समीप ले जाती है।
कथा के दूसरे दिन पंडाल में श्रद्धालुओं की संख्या और उत्साह पहले दिन से कहीं अधिक देखने को मिला। प्रातः से ही वातावरण में भक्ति की अनुभूति होने लगी थी। जैसे ही कथा प्रारंभ हुई, पूरा परिसर “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा।

दूसरे दिन की कथा में कथावाचक ने मानव जीवन के उद्देश्य, परिवार में संस्कारों की भूमिका और गृहस्थ जीवन में धर्म के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कथा सुनना तभी सार्थक है, जब उसे जीवन में उतारा जाए। केवल मंदिर जाना या कथा सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि आचरण में बदलाव ही सच्ची भक्ति है।
कथा के दौरान यह भी बताया गया कि पति-पत्नी का संबंध केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा का सहयात्री होता है। यदि घर का वातावरण शांत, संयमित और संस्कारयुक्त हो, तो वही घर समाज को सही दिशा देता है। माताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों को शब्दों से नहीं, संस्कारों से गढ़ा जाता है—डांट से नहीं, समझाइश और प्रेम से।
दूसरे दिन की कथा में शिव भक्ति के साथ-साथ करुणा, क्षमा और आत्मसंयम का संदेश प्रमुख रहा। श्रद्धालु भावविभोर होकर कथा रस में डूबे रहे। कई भक्तों की आंखों से श्रद्धा के अश्रु छलक पड़े।
कथा का दूसरा दिन यह संदेश देकर समाप्त हुआ कि महादेव तक पहुँचने का मार्ग बाहर नहीं, हमारे भीतर से होकर जाता है। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे श्रोताओं के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन की अनुभूति होने लगी है।
पं. मिश्रा ने यह भी संदेश दिया कि जिस कामना से भक्त भगवान की भक्ति करता है, उसी भाव के अनुरूप महादेव कृपा करते हैं। यदि भाव शुद्ध हो, संकल्प दृढ़ हो और सेवा-भाव जीवन में उतरे, तो शिव कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
इस दिव्य आयोजन ने नागपुरा ही नहीं, पूरे दुर्ग अंचल को शिवमय कर दिया। श्रद्धालुओं ने कथा से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में सत्य, करुणा और भक्ति के पथ पर चलने का संकल्प लिया।

घर से ही रुकेगा अपराध: स्त्री की समझ, संस्कार और सही उपदेश से बदलेगा समाज
आज दुनिया में बढ़ते अपराधों पर यदि गहराई से विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि अपराध की जड़ें अक्सर घर के भीतर से ही जन्म लेती हैं। समाज की पहली पाठशाला घर होता है और उस पाठशाला की पहली गुरु स्त्री—माँ, पत्नी और बहन होती है। यदि घर का वातावरण संस्कारयुक्त, संवादपूर्ण और अनुशासन से भरा हो, तो अपराध स्वतः ही रुकने लगते हैं।
कहा जाता है कि पुरुष का चरित्र बहुत हद तक उसकी पत्नी की समझ और मार्गदर्शन से प्रभावित होता है। यदि पत्नी अपने पति को क्रोध, गलत संगति, नशा, हिंसा या अनैतिक कार्यों से प्रेमपूर्वक रोकती है, उसे सही-गलत का बोध कराती है और धैर्य से समझाती है, तो बहुत-से अपराध जन्म लेने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं। उपदेश डांट से नहीं, बल्कि संवाद, सम्मान और विश्वास से प्रभावी होता है।
इसी प्रकार, माँ की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। कई बार देखा जाता है कि माताएँ गुस्से में बच्चों को यह कह देती हैं— “तेरे पास अकल नहीं है”। ऐसे शब्द बच्चे के आत्मविश्वास को तोड़ देते हैं और उसके मन में विद्रोह, हीनभावना और आक्रोश भर देते हैं। यही आक्रोश आगे चलकर गलत रास्तों की ओर धकेल सकता है।
इसके विपरीत, यदि माँ बच्चे को समझाकर, उसकी गलती बताकर, सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, तो वही बच्चा समाज का जिम्मेदार नागरिक बनता है।

स्त्री यदि घर में संस्कार, संयम और सहानुभूति का वातावरण बनाए—
पति को गलत कार्य से प्रेमपूर्वक रोके,
बच्चों को शब्दों से नहीं, उदाहरण से सिखाए,
और परिवार में संवाद को प्राथमिकता दे—
तो अपराध रोकने के लिए बड़े-बड़े कानूनों से पहले घर के संस्कार ही सबसे प्रभावी हथियार बन जाते हैं।
जब हम इस गाँव में आए, तो देखते ही रह गए।
चारों ओर नज़र डालते ही गाँव ही गाँव दिखाई दे रहा था। दूर तक फैले खेत, कच्चे-पक्के रास्ते, हरियाली से भरे आंगन और सादगी से भरा जीवन—सब कुछ मन को छू लेने वाला था। शहर की भागदौड़ और शोरगुल से दूर, यहाँ की हवा में अपनापन और मिट्टी में खुशबू थी।
हर घर से उठती चूल्हे की धुआँधार लकीरें, बच्चों की खिलखिलाहट, बुजुर्गों की अनुभव भरी बातें और लोगों के चेहरे पर आत्मीय मुस्कान—यह गाँव नहीं, बल्कि संस्कारों और रिश्तों की जीवित पाठशाला प्रतीत हो रहा था।
यहाँ समय भले ही धीमे चलता हो, लेकिन जीवन गहरे अर्थों से भरा हुआ है। चारों तरफ गाँव ही गाँव देखकर यही लगा कि यही वह जगह है जहाँ इंसान आज भी इंसान की तरह जीता है।
परिवार के हर सदस्य के पास मोबाइल, उसी में सब व्यस्त
पं. मिश्रा ने आज के समाज पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग विचारों का मंथन नहीं, बल्कि मोबाइल का मंथन करते हैं। परिवार के हर सदस्य के हाथ में मोबाइल है और लोग सोते ही उठकर सबसे पहले मोबाइल देखने लगते हैं।
उन्होंने रिश्तों में आ रही विकृति पर चिंता जताते हुए कहा कि आज भाई-बहन के साथ भी फोटो साझा करते समय ‘माय सिस्टर’ या ‘चाची के साथ’ जैसे स्टेटस लिखने पड़ते हैं, क्योंकि लोगों की दृष्टि और बुद्धि विचित्र होती जा रही है और गलत सोच पनपने लगी है।
कथा सुनने दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु।
परिवार के बारे में करें चिंतन
रात में सोने से पहले मोबाइल देखने की बजाय अपने परिवार के बारे में चिंतन करें। दान पर बोलते हुए पं. मिश्रा ने कहा कि बाहर कहीं एक-दो रुपए का दान देने की बजाय अपने मोहल्ले के बच्चों की शिक्षा में सहयोग करें, ताकि वे भी आपके बच्चों की तरह नाम रोशन कर सकें। भगवान ने अगर किसी को सक्षम बनाया है, तो आसपास के लोगों की मदद करें, जरूरत पड़ने पर साधन उपलब्ध कराएं। मरीजों की सेवा करें।
सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस मुस्तैद
इधर, शिवपुराण कथा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर दुर्ग पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है। कथा स्थल और आसपास के क्षेत्र में ड्रोन कैमरों से लगातार निगरानी की जा रही है। लगभग 500 पुलिस बल की तैनाती की गई है, वहीं 26 राजपत्रित अधिकारी सुरक्षा बंदोबस्त में तैनात हैं। प्रशासन की चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच श्रद्धालु शांतिपूर्वक कथा का आनंद ले रहे हैं।




