(वरिष्ठ पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन के फेसबुक वाल से) चलिए, अब तो सरकार ने भी मान लिया है कि राजस्थान के ‘ठाकुर नारायण सिंह शेखावत’ ही हमारे छत्तीसगढ़िया अमर शहीद क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह हैं। यकीन न हो तो आज छत्तीसगढ़िया क्रांति के अग्रणी शहीद वीर नारायण सिंह की स्मृति में जारी सरकारी विज्ञापन को देख लीजिए। हर जगह राजस्थान के ठाकुर नारायण सिंह शेखावत की फोटो के आधार पर बनाई गई हट्टे-कट्टे आदमी की मूर्ति को ही शहीद वीर नारायण सिंह घोषित कर दिया गया है। दरअसल, यह फर्जीवाड़ा शुरू हुआ था वीकीपीडिया-गूगल से, वहां शहीद वीर नारायण के नाम पर राजस्थान के शेखावत की फोटो अपलोड की गई थी।
इसके बाद से काॅपी-पेस्ट इस तेजी से हुआ कि अब हकीकत कोसों दूर हो गई है। इन सारे फर्जीवाड़े पर मैनें पहले भी पोस्ट लिखी थी और मुझसे पहले इन तथ्यों को लेकर पुरातत्वविद और छत्तीसगढ़ संस्कृति के जानकार राहुल सिंह Rahul Kumar Singh https://akaltara.blogspot.com/2022/08/blog-post_14.html… लिखते रहें हैं… इसी हवाले से पीयुष कुमार भी लिख चुके हैं…
हैरानी की बात यह है कि इसमें सुधार के लिए दिल्ली से लेकर रायपुर तक किसी ने कोई पहल नहीं की है। यह फर्जीवाड़ा कोई आज का नहीं है, बीते दशक से यह चल रहा है। अभी दो माह पहले मैं रायपुर में केंद्र सरकार के एक संस्थान गया था, वहां पर छत्तीसगढ़ के पुरोधाओं की तस्वीरों की पूरी श्रृंखला दीवारों पर लगवाई गई है।
इनमें भी राजस्थान के ठाकुर नारायण सिंह शेखावत फ्रेम में शहीद वीर नारायण सिंह बन कर मूंछों पर ताव देते नजर आ रहे हैं। इन तस्वीरों को लगवाने वाले सज्जन को मैनें हकीकत बताई तो उन्होंने सिर्फ यही कहा-हम लोगों ने छत्तीसगढ़ शासन जनसंपर्क से तस्वीरें मांगी थी, उन्होंने जो दी, हमने लगा दी। ऐसा हर जगह चल रहा है।
हद तो यह है कि वीर नारायण की शहादत के नाम पर रायपुर के जिस चौक का उद्घाटन फरवरी 1984 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने किया था, उसका बीते बरसों में सरकारी स्तर पर सौंदर्यीकरण किया गया और आधुनिक डिस्प्ले के साथ वहां राजस्थान के इन्हीं शेखावत साहब की फोटो वीर नारायण सिंह के नाम पर लगा दी गई है….
अब तो एआई का दौर है। ऐसे में इन्हीं शेखावत साहब को अब घोड़े पर सवार भी आज कई पोस्ट में देख रहा हूं। लोग जनजातीय गौरव, छत्तीसगढ़िया गौरव बताते हुए इन्हीं शेखावत साहब को श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
अब यह विडम्बना ही है कि हम अपने नायक को हट्टा-कट्टा, मूछों पर ताव देता और घोड़े पर सवार ही देखना चाहते हैं, फिर सोनाखान के शहीद नारायण सिंह के साथ तो सिर्फ तस्वीर या मूर्ति का फर्जीवाड़ा नहीं हुआ है बल्कि उनकी कहानी में भी कई फर्जी तथ्य जोड़े-घटाए जाते रहे हैं। कुछ समय पहले एक पतला सा उपन्यास भी मेरी नजरों से गुजरा है, जिसमें कई कपोल-कल्पित घटनाक्रम के साथ इस आदिवासी नायक को शुरू से आखिरी तक ‘पैलागी’ करते दिखाने में ही लेखक ने पन्ने जाया कर दिए हैं।
तो, फिर असली फोटो और तथ्यपरक कहानी कहां मिलेगी..? यह सब कोई बहुत बड़ा उपक्रम नहीं है। अमर शहीद नारायण सिंह पर अभी और ज्यादा शोध की जरूरत है। जहां तक उनकी असली तस्वीर की बात है तो 1857 के उस दौर के अंग्रेजी शासन के रिकार्ड में तो उनकी कोई फोटो नहीं है।
हां, एक कोशिश रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर की तरफ से हुई थी। दो साल पहले मेरा सोनाखान जाना हुआ था। यहां फोटो में मेरे साथ दिख रहे शहीद नारायण सिंह के वंशज दीवान राजेंद्र सिंह ने तब बताया था कि रविशंकर विश्वविद्यालय की एक चित्रकार को मेरे पिताजी की फोटो दी गई थी, इस आधार पर एक पेंटिंग बनीं और उस पेंटिंग के आधार पर यह प्रतिमा बनाई गई है, जिस पर हम सभी वंशज सहमत हैं कि नारायण सिंह ऐसे ही कद-काठी और चेहरे मोहरे के होंगे…
वीर नारायण सिंह को स्थापित करने की हड़बड़ी में ऐसे ही कई तथ्य बिना पड़ताल के जोड़े गए थे। इनमें एक फांसी की तारीख का भी है..जज के फैसले में अंग्रेजी में D/9 लिखा है…
इसे कई साल तक दिसंबर 19 समझ कर 19 दिसंबर को शहादत दिवस मनाया जाता रहा। हाल के बरसों में इसे एनलार्ज कर अच्छी तरह पढ़ा गया, तब समझ में आया कि यह दिसंबर 9 का फैसला था, अगली सुबह 10 दिसंबर को फांसी देने का…
जिस तरह फांसी की तारीख सुधारी गई है, वैसे ही वीर नारायण से जुड़ी फोटो व अन्य गलतियां भी सुधारी जानी चाहिए..उम्मीद है ये सरकार इस पर साय-साय अमल करेगी।




