गाइडलाइन में भारी विसंगति: छोटे टुकड़ों की रजिस्ट्री पर अघोषित रोक और किसानों पर बढ़ाया गया लाखों का बोझ। 31 दिसंबर तक दावा-आपत्ति का समय, फिर अभी से दर सही ठहराने की जल्दबाजी क्यों?
दुर्ग। भिलाई जिला कांग्रेस कमेटी भिलाई के प्रवक्ता जावेद खान ने जिला पंजीयन विभाग, दुर्ग द्वारा संपत्ति की नई गाइडलाइन दरों (2025-26) को लेकर जो दावे किए जा रहे हैं, उसे पूरी तरह से भ्रामक, चयनित और जनता को गुमराह करने वाल बताया, कांग्रेस पार्टी जिला पंजीयक के इस दावे को सिरे से खारिज करती है। हकीकत यह है कि नई गाइडलाइन से न तो किसानों को फायदा है और न ही आम जनता को, जमीन खरीदना अब एक आम आदमी का सपना बनकर रह जाएगा।
जिला प्रशासन ने नगपुरा और मोहलाई के चुनिंदा और छोटे (0.04 व 0.0290 हेक्टेयर) उदाहरण देकर यह दिखाने की कोशिश की है कि रजिस्ट्री सस्ती हुई है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि शासन ने 5 डिसमिल से छोटे टुकड़ो की रजिस्ट्री पर अघोषित बैन लगा रखा है। जब छोटे टुकड़े बिकेंगे ही नहीं, तो उस ‘कागजी राहत’ का आम जनता को क्या लाभ?
पिछली सरकार बनाम वर्तमान सरकार: 5 से 7 गुना की लूट
तथ्यों पर बात करें तो पिछली कांग्रेस सरकार और वर्तमान भाजपा सरकार की नई दरों में जमीन-आसमान का अंतर है।
ग्राम नगपुरा का उदाहरण:
कांग्रेस सरकार : ग्राम नगपुरा मे सरकारी रेट 2779000/-रु हेक्टेयर था, 1 एकड़ जमीन की कीमत लगभग 11.25 लाख रु. होती थी और रजिस्ट्री खर्च करीब 1.19 लाख रु. आता था।
नई गाइडलाइन (2025-26): नई गाइडलाइन में असिंचित भूमि के लिए कोई दर निर्धारित नहीं है। सिंचित भूमि का मूल्य ₹1,74,30,000/- तय किया गया है, और इसी मूल्य में 20% की कमी करके असिंचित भूमि का मूल्यांकन करने का नियम है। इसके अनुसार अब 1 एकड़ असिंचित जमीन का मूल्य 56.47 लाख रु. हो गया है और रजिस्ट्री खर्च बढ़कर 5.98 लाख रु.।
निष्कर्ष: कीमत और खर्च में सीधे 5 गुना की वृद्धि।
ग्राम मोहलाई का उदाहरण:
कांग्रेस सरकार (2019-20): असिंचित जमीन का मूल्य 20,02,000/- रु प्रति हेक्टेयर था, 1 एकड़ जमीन की कीमत लगभग 8.11 लाख रु. होती थी और रजिस्ट्री खर्च मात्र 86,000 रु. था।
नई गाइडलाइन (2025-26): अब उसी जमीन का मूल्य 56.47 लाख रु. और रजिस्ट्री खर्च 5.98 लाख रु. होगा।
निष्कर्ष: कीमत और खर्च में लगभग 7 गुना की वृद्धि।
किसानों और उद्योगों दोनों पर प्रहार
कृषि और व्यावसायिक भूमि के ‘समान मूल्यांकन’ का सच एक बड़ा धोखा
“शासन द्वारा यह प्रचारित किया जा रहा है कि कृषि भूमि और परिवर्तित (व्यावसायिक/औद्योगिक) भूमि का मूल्यांकन अब एक समान दर से होगा, जिससे सरलीकरण होगा। लेकिन यह दावा पूरी तरह से ‘आंखों में धूल झोंकने’ जैसा है।
सच्चाई यह है कि सरकार ने अपने राजस्व घाटे की भरपाई के लिए जनता की जेब काटने का पूरा इंतजाम कर लिया है। पूर्व के नियमों में उद्योग या व्यावसायिक उपयोग की जमीन का स्टाम्प शुल्क कृषि भूमि की दर से ढाई गुना (2.5 गुना) अधिक होता था। नई गाइडलाइन में सरकार ने इस ‘ढाई गुना’ के नियम को तो हटा दिया, लेकिन जमीन की मूल सरकारी दर (बेस रेट)को ही 5 से 7 गुना तक बढ़ दिया है।
न किसान बचा, न व्यापारी: जब मूल दर ही कई गुना बढ़ गई, तो उद्योगों को ‘समान दर’ होने का कोई फायदा नहीं मिलेगा, बल्कि उन्हें पहले से भी ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा। सबसे बुरा असर किसानों पर पड़ा है। एक किसान, जिसकी आय सीमित है, उसे अब उद्योगपतियों के बराबर ही जमीन की कीमत और स्टाम्प शुल्क चुकाना होगा। 5 से 7 गुना बढ़ी हुई दरों पर स्टाम्प शुल्क पटाना (भुगतान करना) अब किसी भी साधारण किसान के बस की बात नहीं रही।
गाइडलाइन दर बढ़ने का असर सिर्फ रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में इसके आधार पर प्रॉपर्टी टैक्स, इनकम टैक्स और डायवर्सन लगान में बेतहाशा वृद्धि होगी, जिससे शहर और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के नागरिकों की जेब पर डाका डाला जाएगा। जब सरकार ने गाइडलाइन के संबंध में 31 दिसंबर तक ‘दावा-आपत्ति’ मांगी है, तो उससे पहले ही मीडिया में चुनिंदा उदाहरण देकर इसे सही ठहराने का प्रयास क्यों किया जा रहा है? यह सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है।
