पटना (आलोक तिवारी)। बिहार की सियासत में इस बार जो हुआ, उसने हर राजनीतिक पंडित की भविष्यवाणी को उलट-पलट कर रख दिया। एनडीए ने वह कर दिखाया जिसे राजद ने कभी सोचा भी नहीं था—जनता का मूड पढ़कर अपनी रणनीति को जमीनी स्तर तक उतार दिया। वहीं दूसरी ओर राजद महागठबंधन गुटबाजी, असंतोष और अपने ही पुराने आरोपों के बोझ तले दब गई। आइए जानिए पूरे चुनाव के रोमांचक अंदरूनी कारण—
एनडीए की जीत के पीछे कौन-सी तीन बातें बनी मास्टर स्ट्रोक?
सेंट्रल से बूथ तक ‘मिशन मोड’ – हर वोट पर पैनी नजर
इस बार एनडीए ने चुनाव को जैसे ऑपरेशन की तरह संभाला। दिल्ली में बैठा सेंट्रल वॉर रूम, पटना की कोर टीम और गांव-कस्बों के बूथ प्रभारी—सब एक ही ताल पर चलते दिखे।
मॉनिटरिंग इतनी मजबूत थी कि किस बूथ पर कौन सा वोटर निकला, किसको फोन किया गया… सबका रियल-टाइम रिकॉर्ड!
यही हाईटेक मॉनिटरिंग विपक्ष के लिए सिरदर्द बन गई।
महिलाएं और युवा—दोनों बड़े वोटबैंक में सीधी पैठ
एनडीए ने दो बड़े वोट समूहों को सीधे साधा—महिलाएं और युवा।
महिलाओं को सुरक्षा, योजनाएं और स्थिर शासन का भरोसा
युवाओं को रोजगार, स्किल और भविष्य की गारंटी वाले वादे
यह दोतरफा रणनीति सीधे एनडीए के वोट बैंक में सुनामी बनकर लौटी।
‘सुशासन’ बनाम ‘जंगलराज’—नैरेटिव वॉर में एनडीए की क्लीन स्वीप
एनडीए ने पूरे चुनाव में एक ही संदेश जनता के दिमाग में गहरा बिठाया—
“हम सुरक्षा देते हैं, वे भय।”
राजद के पुराने दौर के आरोपों को फिर से ताजा कर दिया गया और यह नैरेटिव गांव-गांव में इतनी तेज़ी से फैला कि राजद का पूरा कैंपेन पीछे रह गया।

राजद कैसे हार गई? तीन बड़ी वजह जो अंदर ही अंदर पार्टी को डुबो गईं
टिकट बंटवारे का बम – महागठबंधन के भीतर असंतोष का महाप्रलय
महागठबंधन में टिकट बंटवारे को लेकर भारी असंतोष रहा। कई अनुभवी नेताओं को जैसे किनारे कर दिया गया।
पूरी कैंपेनिंग तेजस्वी यादव अकेले संभालते दिखे। बाकी सहयोगी दलों की सक्रियता नाम मात्र की रही।
तेज प्रताप—कैंपेन में ‘नुकसान का केंद्र’
तेज प्रताप यादव इस बार राजद के लिए समस्या बनकर उभरे।
उनकी बयानबाजी, तेवर और पार्टी के भीतर की खींचतान ने राजद की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया।
विरोधियों को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा मिल गया।
क्राइम, महिला असुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे पुराने आरोपों का जवाब नहीं दे पाई राजद
राजद बार-बार जनता को यह समझाने में असफल रही कि “पुराना राजद” अब नहीं रहा।
महिलाओं की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर एनडीए का अटैक इतना आक्रामक था कि राजद प्रभावी काउंटर नैरेटिव ही नहीं बना पाई।
नतीजा:
बिहार के मैदान में एनडीए रणनीति से जीता, जबकि राजद संगठन और नैरेटिव की लड़ाई में हार गया।
यह चुनाव सिर्फ वोटों का नहीं था… यह प्रबंधन, भरोसा और छवि की लड़ाई थी—और इसमें एनडीए ने बाज़ी मार ली।