Wednesday, March 4, 2026

भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है ‘भिलाई ज़िंदाबाद’

समीक्षा- डॉ. सुधीर शर्मा

छत्तीसगढ़। भारत के औद्योगिक इतिहास में कुछ शहर केवल नक्शे पर दर्ज नाम नहीं होते, वे अपने भीतर एक युग की स्मृतियाँ, संघर्ष और सपने सँजोए रहते हैं। छत्तीसगढ़ की धरती पर बसा भिलाई ऐसा ही शहर है, जिसकी पहचान केवल एक औद्योगिक नगर के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की जीवंत प्रयोगशाला के रूप में रही है। यहाँ की मिट्टी में श्रम की गंध है, यहाँ की सड़कों पर इतिहास के पदचिह्न हैं और यहाँ की हवा में उस दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जब राष्ट्र निर्माण एक सामूहिक संकल्प हुआ करता था।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने जिस समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया, उसमें भारी उद्योगों को राष्ट्र की रीढ़ माना गया। इसी सोच के केंद्र में रहा भिलाई इस्पात संयंत्र, जिसकी स्थापना केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षा का प्रतीक थी। 1950 के दशक में जब देश योजनाबद्ध विकास की राह पर अग्रसर हुआ, तब भिलाई का नाम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उभरने लगा। यह वह समय था जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भारी उद्योगों को आधुनिक भारत के ‘नए मंदिर’ कहा करते थे। भिलाई उन्हीं मंदिरों में से एक बना, जहाँ मशीनों की गड़गड़ाहट के साथ भविष्य की रूपरेखा गढ़ी जा रही थी।

भिलाई की स्थापना की कहानी केवल सरकारी फाइलों या योजनाओं में सीमित नहीं है। यह उन गाँवों की कहानी भी है जिनकी जमीन अधिग्रहित हुई, उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपनी पुरानी दुनिया छोड़कर नई बस्तियों में जीवन बसाया। कोटराभाठा, सोंठभाठा, बोरिया, हिंगना और मरौदा जैसे गाँवों की स्मृतियाँ आज भी बुज़ुर्गों की बातचीत में जीवित हैं। खेतों की हरियाली के स्थान पर जब सेक्टरों की व्यवस्थित रेखाएँ खिंचीं, तब एक ग्रामीण भूगोल शहरी परिदृश्य में बदल गया। यह परिवर्तन सहज नहीं था, परंतु समय की धारा में वह अपरिहार्य बन गया।

भिलाई का एक विशेष पक्ष उसकी बहुसांस्कृतिक संरचना है। देश के कोने-कोने से आए इंजीनियर, तकनीशियन और श्रमिक यहाँ एक साथ बसे। बंगाल, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण भारत से आए लोगों ने अपनी-अपनी भाषाएँ, खान-पान और त्योहार साथ लाए। इस विविधता ने भिलाई को केवल औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगम बना दिया। दुर्गा पूजा से लेकर गणेशोत्सव और छत्तीसगढ़ी लोकपर्वों तक, यहाँ उत्सवों की एक साझा परंपरा विकसित हुई। इस मेलजोल ने एक ऐसी नागरिक संस्कृति को जन्म दिया, जिसमें स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों रंग समाहित हैं।

समय के साथ भिलाई ने केवल विकास ही नहीं, संकट भी देखे। औद्योगिक दुर्घटनाएँ, श्रमिक आंदोलन, बिजली और कोयले के संकट, आर्थिक उदारीकरण के बाद की चुनौतियाँ—इन सबने इस नगर को झकझोरा। 1990 के दशक में जब देश ने उदारीकरण की नीति अपनाई, तब सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। निजीकरण और आउटसोर्सिंग की प्रक्रियाओं ने पुराने ढाँचे को चुनौती दी। भिलाई भी इससे अछूता नहीं रहा। उत्पादन के नए मानदंड, तकनीकी आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने इस इस्पात नगरी को आत्ममंथन के लिए विवश किया।

फिर भी, यह उल्लेखनीय है कि भिलाई ने हर संकट के बाद स्वयं को पुनर्गठित किया। यहाँ की श्रमिक चेतना और प्रबंधन की सामूहिक समझ ने कई बार संभावित ठहराव को नई गति में बदला। इस्पात की तरह ही इस शहर की आत्मा भी तपकर मजबूत हुई। भिलाई की पहचान केवल उत्पादन के आँकड़ों से नहीं, बल्कि उस मानवीय रिश्ते से है जो यहाँ के लोगों को जोड़ता है। सेक्टरों की योजनाबद्ध बस्तियाँ, स्कूल, अस्पताल, पार्क और सांस्कृतिक भवन—ये सब उस कल्याणकारी सोच के प्रतीक हैं, जिसने इस नगर को आकार दिया।
आज जब डिजिटल युग में सूचना और संचार के साधन बदल रहे हैं, तब भी भिलाई का इतिहास हमें यह सिखाता है कि विकास केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की निरंतरता भी है। यहाँ की पीढ़ियाँ बदल रही हैं; पुराने श्रमिकों की जगह नई तकनीकी दक्षता वाले युवा ले रहे हैं। फिर भी, शहर की स्मृतियों में वह दौर जीवित है जब इस्पात संयंत्र के सायरन के साथ दिन की शुरुआत होती थी और शाम को श्रमिक कॉलोनियों में जीवन की चहल-पहल गूँजती थी।

भिलाई की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि औद्योगिक नगर केवल आर्थिक इकाइयाँ नहीं होते, वे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रयोगशालाएँ भी होते हैं। यहाँ श्रम और सपनों का संगम हुआ, यहाँ संघर्ष और सहयोग का संतुलन बना। यह शहर आज भी अपने अतीत के गौरव और वर्तमान की चुनौतियों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ रहा है।
समय के बदलते परिदृश्य में जब सार्वजनिक उपक्रमों की भूमिका पर बहस जारी है, तब भिलाई एक जीवंत उदाहरण की तरह सामने खड़ा है। यह शहर हमें बताता है कि यदि दूरदृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और तकनीकी नवाचार साथ हों, तो कोई भी औद्योगिक परियोजना केवल कारखाना नहीं रहती, वह समाज का धड़कता हुआ हृदय बन जाती है।
भिलाई की गाथा दरअसल उस भारत की गाथा है जिसने कठिनाइयों के बीच अपने लिए रास्ता बनाया। यह उस विश्वास की कहानी है कि विकास केवल मशीनों से नहीं, मनुष्यों से होता है। इस फौलादी नगर की आत्मा में आज भी वही उम्मीद धड़कती है—कि समय चाहे जैसा भी हो, श्रम, साहस और सामूहिकता की शक्ति से भविष्य गढ़ा जा सकता है।

प्रस्तुत पुस्तक ”भिलाई ज़िंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां” के लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने भिलाई को जीया है, बचपन से लेकर अपनी जवानी की सांसें भिलाई को दी हैं। वे एक रचनात्मक और सकारात्मक पत्रकारिता तथा लेखन के सच्चे श्रमिक हैं। अपने अनुभव और भिलाई को ढालने वाले अनेक विभूतियों से सुनकर तथा समझकर उन्होंने यह पुस्तक लिखी है। बीते बीस-तीस बरस के देखे-सुने किस्सों का यह संग्रह है। ‘भिलाई ज़िंदाबाद’ सही मायनों में भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है। लेखक को इसके लिए साधुवाद है। ये किस्से आनेवाली पीढ़ी के लिए इतिहास से लेकर वर्तमान की गाथा है। भविष्य के सपनों को पूरा करने का मंत्र है। बधाई जाकिर और धन्यवाद उन किस्सागोई व्यक्तित्वों का जो इसके गवाह हैं।

(डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़)

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