Saturday, January 17, 2026

दिल्ली पब्लिक स्कूल दुर्ग के वार्षिक सांस्कृतिक उत्सव में नजर आई ऐतिहासिक कालखंड की झलक

भारत के स्वर्णिम इतिहास को दर्शाया, मोहनजोदड़ो से लेकर अब तक की नृत्य शैलियों को मंच में उतारा, मंत्री साव ने की सराहना

दुर्ग। दिल्ली पब्लिक स्कूल दुर्ग में बुधवार को वार्षिक सांस्कृतिक उत्सव अनुगूंज 25 गरिमामय एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव रहे। दैनिक हरिभूमि और आईएनएच के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी, सात्विक सिंधु, प्रबंधक एचएस बत्रा, पूर्व प्राचार्य परवीन रशीद, वैशालीनगर विधायक रिकेश सेन विशेष रूप से उपस्थित थे। सभी अतिथियों ने विद्यालय की शैक्षणिक व सांस्कृतिक उपलब्धियों की प्रशंसा की। उत्सव का प्रमुख आकर्षण युग यात्रा रहा, जिसके अंतर्गत विद्यार्थियों ने मोहन जोदड़ो सभ्यता से लेकर समकालीन नृत्य तक की विभिन्न नृत्य शैलियों को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया। ऐतिहासिक कालखंडों की झलक और आधुनिक कलात्मक अभिव्यक्तियों का यह अनूठा संगम दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना। उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने विद्यार्थियों के आत्मविश्वास और प्रतिभा की सराहना करते हुए उन्हें निरंतर प्रगति हेतु प्रेरित किया।

विद्यालय की निदेशक पुनीता नेहरू ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए शैक्षणिक उपलब्धियों, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता, खेल-कूद और सह-शैक्षणिक गतिविधियों में विद्यार्थियों के प्रदर्शन तथा वर्षभर की समग्र प्रगति का विस्तृत उल्लेख किया। समारोह के दौरान वर्ष भर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में आर्केस्ट्रा समूह का संगीत, माइम तू खुद की तलाश में निकल का प्रेरक संदेश तथा जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के प्रसिद्ध नाटक पिगमालियन की प्रभावशाली प्रस्तुति विशेष रूप से सराहनीय रहीं। छात्रों की रचनात्मकता, अभिनय और मंच-कौशल पूरे कार्यक्रम में झलकता रहा। कार्यक्रम के समापन पर सभी अतिथियों, अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया तथा बच्चों को नई दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्जवलित कर किया। इस दौरान उप मुख्यमंत्री ने विद्यालय के मेधावी छात्र-छात्राओं को शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में छात्रों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से शानदार प्रदर्शन किया, जिसे सभी अतिथियों और अभिभावकों ने खूब सराहा। वार्षिक उत्सव में प्राचार्य व निदेशक श्रीमती पुनीता नेहरू ने पिछले शैक्षणिक सत्र की उपलब्धियों और गतिविधियों को वार्षिक रिपोर्ट के माध्यम से साझा किया। साव ने छात्रों को प्रेरित करते हुए प्राचार्य की प्रशंसनीय नेतृत्व क्षमता की सराहना की। उन्होंने कहा कि किसी भी विद्यालय की दिशा और दशा निर्धारित करने में प्राचार्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, और डीपीएस स्कूल का नेतृत्व उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक है। साव अपने छात्र जीवन को याद करते हुए कहा कि डीपीएस विद्यालय में पढ़ना छात्रों का सौभाग्य है, जहां प्राचार्य ऊर्जावान और संवेदनशील नेतृत्व प्रदान करती है। उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि आपके जीवन का हर एक मिनट बेहद कीमती है। यदि इसे समझ लिया जाए तो ऊँचाइयों को छूने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने छात्रों से माता-पिता के सपनों को साकार करने और परिवार का नाम रोशन करने का आह्वान किया। उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि डिप्रेशन जैसे शब्द को अपनी डिक्शनरी से हटा दें। छोटी-मोटी असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उनसे सीखकर आगे बढ़ना चाहिए। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने प्रेरणादायी पंक्तियों के साथ छात्रों में उत्साह का संचार किया-हौसला है तो चल के मंजर भी आएगा, प्यासे के पास चलकर समंदर भी आएगा, मंजिल भी मिलेगी और जीने का मजा भी आएगा।

बदलते युग के साथ इस तरह जम्बूद्वीप बना कल का इंडिया और आज का हिंदुस्तान

युग यात्रा के दर्शाया गया कि इतिहास का पहला पन्ना करीब 10 हजार साल पहले लिखा गया था। युग के बदलने के साथ देश को कई नाम मिले, जिसमें सबसे प्रचलित नाम भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया है। उत्तरवैदिक काल के विभिन्न धर्मग्रंथों में देश को महान सम्राट चक्रवर्ती राजा भरत के सम्मान में भारत कहे जाने का उल्लेख है। विष्णु पुराण, वायु पुराण, लिंग पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, अग्नि पुराण, स्कन्द पुराण और मार्कण्डेय पुराण में यह नाम आता है। भारत ने सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, रंगपुर जैसे नगरों का विकास देखा। वहीं आर्य सभ्यता में गांधार अफगानिस्तान का कंधार, पुरुषपुर पाकिस्तान का पेशावर, तक्षशिला पाकिस्तान, पाटलिपुत्र पटना, उज्जयिनी उज्जैन, कौशाम्बी जैसे शहरों का विकास हुआ। इसी दौर में दक्षिण भारत के निवासियों ने समुद्र पार दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रसार किया, जिसके प्रमाण इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया आदि देशों में मिलते हैं। जैन परंपरा के अनुसार भगवान ऋषभदेव, नाभिराज के पुत्र थे। ऋषभदेव के पुत्र भरत थे। उनके ही नाम पर इस देश काे नाम भारतवर्ष मिला। स्कन्द पुराण अध्याय 37 विष्णुपुराण, वायुपुराण, लिंगपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, अग्निपुराण और मार्कण्डेय पुराण में भी ऐसा ही उल्लेख है। इस प्रकार इतिहास को युग यात्रा के माध्यम से दर्शाया गया।

ताज़ा ख़बरें

खबरें और भी हैं...

अतिरिक्त ख़बरें