Saturday, January 17, 2026

वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट: एलआईसी के अदानी निवेश पर सरकारी दबाव के आरोप, विपक्ष की जांच की मांग

सुरेश महापात्रा,नई दिल्ली। अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की एक तहकीकाती रिपोर्ट ने भारत में राजनीतिक और वित्तीय हलकों में हंगामा मचा दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जब गौतम अदानी के नेतृत्व वाले अदानी समूह पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा था और अंतरराष्ट्रीय बैंक फंडिंग में हिचकिचा रहे थे, तब भारतीय सरकार ने सरकारी स्वामित्व वाली लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (एलआईसी) के माध्यम से लगभग 3.9 अरब डॉलर (करीब 33,000 करोड़ रुपये) का निवेश करवाया।

रिपोर्ट आंतरिक दस्तावेजों और गुमनाम अधिकारियों के बयानों पर आधारित है, जो वित्त मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज (डीएफएस), नीति आयोग और एलआईसी के बीच समन्वय को उजागर करती है।

रिपोर्ट के मुख्य दावेवॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट, जो पत्रकार प्रांशु वर्मा और रवि नायर द्वारा लिखी गई है, के अनुसार मई 2025 में डीएफएस ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें एलआईसी को अदानी समूह की कंपनियों – जैसे अदानी ग्रीन एनर्जी, अंबुजा सीमेंट्स और अदानी पोर्ट्स – में निवेश करने की सिफारिश की गई।

दस्तावेजों में कहा गया है कि यह निवेश “अदानी समूह में विश्वास जगाने” और “अन्य निवेशकों को प्रोत्साहित करने” के उद्देश्य से किया गया। रिपोर्ट में उल्लेख है कि अदानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन (एपीएसईजेड) ने मई में 5,000 करोड़ रुपये (करीब 585 मिलियन डॉलर) का बॉन्ड जारी किया, जिसे एलआईसी ने अकेले ही सब्सक्राइब कर लिया।

यह निवेश अदानी समूह के मौजूदा कर्ज को रिफाइनेंस करने के लिए था। दस्तावेजों में जोखिमों का भी जिक्र है, जैसे 2023 की हिंदनबर्ग रिपोर्ट के बाद एलआईसी को अदानी शेयरों में 5.6 अरब डॉलर का कागजी नुकसान हुआ था, और अमेरिका में अदानी पर धोखाधड़ी व रिश्वतखोरी के आरोप चल रहे हैं। फिर भी, वित्त मंत्रालय ने “त्वरित समीक्षा और आसान मंजूरी” की सिफारिश की।

रिपोर्ट में कई पूर्व और वर्तमान अधिकारियों तथा बैंकरों के गुमनाम इंटरव्यू का हवाला दिया गया है, जो दावा करते हैं कि यह योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अदानी को “बेलआउट” देने का हिस्सा थी। नीति आयोग को भी इस योजना में शामिल बताया गया है, जो भारत सरकार का प्रमुख थिंक टैंक है।

एलआईसी और अदानी समूह की प्रतिक्रियारिपोर्ट के तुरंत बाद एलआईसी ने एक आधिकारिक बयान जारी कर आरोपों को “झूठा, निराधार और सच्चाई से कोसों दूर” बताया। कंपनी ने कहा, “एलआईसी ने कभी भी अदानी समूह में निवेश का कोई रोडमैप तैयार करने वाला दस्तावेज या योजना नहीं बनाई।

सभी निवेश निर्णय बोर्ड की नीतियों के अनुसार विस्तृत जांच-पड़ताल के बाद स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं। वित्त विभाग या किसी अन्य संस्था की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” एलआईसी ने जोर दिया कि उसके निवेश लाभदायक रहे हैं और हितधारकों के हित में हैं।

अदानी समूह ने भी इनकार किया कि यह निवेश किसी सरकारी योजना का हिस्सा था। कंपनी ने कहा, “एलआईसी कई कॉर्पोरेट समूहों में निवेश करती है और अदानी को पक्षपात का दावा भ्रामक है। हमारा विकास पीएम मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व से पहले का है।” अदानी ने जोड़ा कि एलआईसी ने उनके पोर्टफोलियो से अच्छा रिटर्न कमाया है। नीति आयोग की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, जैसा कि रिपोर्ट में उल्लेखित है।

विपक्ष का हमला: जांच की मांगरिपोर्ट ने विपक्षी दलों को हथियार दे दिया है। कांग्रेस ने इसे “सार्वजनिक धन का जबरन दुरुपयोग” करार देते हुए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और लोक लेखा समिति (पीएसी) से जांच की मांग की।

पार्टी के संचार प्रमुख जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर लिखा, “वित्त मंत्रालय और नीति आयोग के अधिकारियों ने किस दबाव में अदानी को बचाने का फैसला लिया? यह भारत के लोगों का नुकसान है।” कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जून 2025 में ही इस मुद्दे को उठाया था, और अब इसे “मोदी-अदानी गठजोड़” का सबूत बताया जा रहा है।

पार्टी ने ट्वीट्स के जरिए कहा कि जब अमेरिकी अदालतों में अदानी पर घूसखोरी के केस चल रहे थे, तब मोदी सरकार ने एलआईसी पर दबाव डाला। तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा ने ट्वीट किया, “मोदी सरकार लगातार अदानी को फंड देती है और जनता को बेलआउट का बोझ उठाना पड़ता है।”

सागरिका घोस ने सवाल उठाया, “एलआईसी में लाखों मेहनती भारतीयों का पैसा है। क्या जांच हुई या जनता का पैसा सिर्फ मोदी के दोस्तों के लिए है?”पृष्ठभूमि: अदानी समूह पर लगे पुराने आरोपगौतम अदानी, दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति (संपत्ति करीब 90 अरब डॉलर), पर पहले भी धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं।

2023 की हिंदनबर्ग रिपोर्ट ने शेयर मैनिपुलेशन और अकाउंटिंग अनियमितताओं का खुलासा किया था। अमेरिका में सोलर प्रोजेक्ट्स से जुड़े 265 मिलियन डॉलर के रिश्वतखोरी के मामले में अदानी, उनके भतीजे सागर अदानी समेत कई पर मुकदमा चल रहा है। भारत में सेबी की जांच जारी है। अदानी समूह की कंपनियां कोयला खदानें, बंदरगाह, हवाई अड्डे और हरित ऊर्जा क्षेत्रों में सक्रिय हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल के हाइफा पोर्ट में उनकी हिस्सेदारी भी जोखिमपूर्ण है, जहां यमन के हूती विद्रोहियों की धमकियां हैं।विशेषज्ञों की रायविश्लेषकों का मानना है कि यह मामला भारत में “क्रोनी कैपिटलिज्म” (सत्ता और पूंजी के गठजोड़) का उदाहरण है। स्वतंत्र विश्लेषक हेमिंदर हजारी ने कहा, “एलआईसी का इतना बड़ा निवेश एक निजी कंपनी में असामान्य है। अगर एलआईसी को नुकसान हुआ तो सरकार ही बेलआउट करेगी।”

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने एलआईसी के निवेश को बाजार-आधारित बताया, क्योंकि अदानी पोर्ट्स को भारत की सर्वोच्च ‘एएए’ क्रेडिट रेटिंग मिली हुई है।निष्कर्ष: विवाद की आग में भारत का वित्तीय सेक्टरयह रिपोर्ट न केवल एलआईसी की स्वायत्तता पर सवाल उठाती है, बल्कि सरकारी संस्थाओं के निजी कंपनियों में निवेश की पारदर्शिता पर भी।

एलआईसी, जो 25 करोड़ से अधिक पॉलिसीधारकों (मुख्यतः गरीब और ग्रामीण परिवारों) की बचत संभालती है, का यह निवेश सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर बहस छेड़ रहा है। विपक्ष की जांच मांग के बीच, सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

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