Saturday, January 17, 2026

किसी भी ब्राड को स्थापित करने में महारत थी पीयूष पांडेय को , इंटरनेशनल मार्केट में भारत को दी नई पहचान

आज ओगिल्वी संस्था ने अपने एडगुरू पीयूष पांडे को कुछ इस तरह से याद किया है कि उनके शब्दों को गहराई से समझने की दरकार है

एक कामन मैन की तरह सोचने और उसे किसी भी ब्रांड को स्थापित करने की महारत हासिल थी पीयूष में…

हमने टीवी के दौर में कई जिंगल्स सुने हैं जो हमारे दिलो ​में अब तक कायम हैं…

ये महज कुछ शब्दों की जादूगरी नहीं थी बल्कि वह उस ब्रांड की पहचान बन गई…

जयपुर। पीयूष पांडे (5 सितंबर 1955 – 23 अक्टूबर 2025) भारतीय विज्ञापन जगत के एक महान व्यक्तित्व थे, जिन्हें ‘एडमैन’ के नाम से जाना जाता है।

जयपुर में जन्मे पीयूष एक बड़े परिवार से थे, जिसमें नौ बच्चे थे – सात बहनें और दो भाई। उनके भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्देशक हैं, जबकि बहन ईला अरुण गायिका व अभिनेत्री हैं। पीयूष ने 1982 में ओगिल्वी (Ogilvy) में ट्रेनी अकाउंट एक्जीक्यूटिव के रूप में अपना करियर शुरू किया और धीरे-धीरे क्रिएटिव डिपार्टमेंट में शिफ्ट हो गए।

उन्होंने ओगिल्वी को भारत की सबसे प्रमुख विज्ञापन एजेंसी बनाया और खुद चीफ क्रिएटिव ऑफिसर वर्ल्डवाइड (2019) तथा एक्जीक्यूटिव चेयरमैन इंडिया बने।उन्होंने भारतीय विज्ञापन को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त कर हिंदी, लोकल ह्यूमर और भावनात्मक कहानियों से भर दिया, जिससे ब्रांड्स को घर-घर पहुंचाया। 2016 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

2024 में उन्हें LIA लेजेंड अवॉर्ड मिला। वे कांस लायंस फेस्टिवल के पहले एशियन जूरी प्रेसिडेंट भी बने। 2010 में एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया से लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2012 में क्लियो लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्राप्त हुआ। 2018 में कांस में उनके भाई प्रसून के साथ लायंस लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड जीता।

सितंबर 2023 में ओगिल्वी ने उन्हें चीफ एडवाइजर की भूमिका में शिफ्ट किया, जो 1 जनवरी 2024 से प्रभावी हुआ।पीयूष पांडे ने चार दशकों में विज्ञापन को सांस्कृतिक धरोहर बना दिया। उन्होंने पोलियो उन्मूलन अभियान (‘दो बूंद जिंदगी की’) और ‘मिले सूर मेरा तुम्हारा’ जैसे सोशल कैंपेन भी लीड किए।

23 अक्टूबर 2025 को मुंबई में एक संक्रमण के कारण उनका निधन हो गया, जिसकी उम्र 70 वर्ष थी। उनकी पत्नी नीता पांडे हैं।पीयूष पांडे की कुछ विख्यात एड लाइनेपीयूष पांडे की रचनाएं इतनी प्रभावशाली थीं कि वे ब्रांड्स के साथ-साथ सांस्कृतिक वाक्यांश बन गईं।

कैडबरी डेयरी मिल्क
“कुछ खास है ज़िंदगी में”
1990 के दशक का क्रिकेट मैदान पर नाचती लड़की वाला ऐड, जो खुशी और उत्सव को चॉकलेट से जोड़ता है। यह लाइन जीवन के सुखद पलों का प्रतीक बनी।

फेविकॉल
“फेविकॉल का मजबूत जोड़ है” / “तोड़ो मत, जोड़ो” / “झाड़ू लगेगी रे भैया लोगों”
हास्यपूर्ण ऐड्स जैसे भरी हुई बस या अटकी हुई झाड़ू, जो चिपकाने की ताकत को मजेदार तरीके से दिखाते हैं। ये लाइनें रोजमर्रा की भाषा में घर-घर गूंजीं।

एशियन पेंट्स
“हर घर कुछ कहता है”
घर की कहानी को रंगों से जोड़ने वाला इमोशनल कैंपेन, जो ब्रांड को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाया।

हच/वोडाफोन
“Wherever you go, our network follows” / “You and I”
पग डॉग वाला कैंपेन, जो वफादारी और कनेक्शन को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाता है। ‘Zoozoo’ कैरेक्टर्स भी उनकी देन हैं।

भाजपा 2014 चुनाव कैंपेन
“अबकी बार मोदी सरकार” / “अच्छे दिन आने वाले हैं”
राजनीतिक विज्ञापन में क्रांति लाने वाला स्लोगन, जो 2014 चुनावों में घर-घर गूंजा और मोदी की जीत का प्रतीक बना।

पॉन्ड्स
“गूगली वूगली वूश!!”
हल्का-फुल्का, मजेदार ऐड जो ब्रांड को युवाओं से जोड़ता है।

ये लाइनें न सिर्फ बिक्री बढ़ाती थीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गईं। पीयूष पांडे की विरासत विज्ञापन को ‘कहानी’ बनाने में है, जो आज भी प्रेरणा देती है।

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