Friday, January 16, 2026

महर्षि दयानंद बलिदान दिवस मनाया गया

जीवन में दया और आनंद का समावेश जरूरी है

दीपक से सीखे स्वयं प्रकाशित होकर दूसरे को प्रकाशित करना आचार्य डॉ. आर्य

छत्तीसगढ़आर्य: समाज वैदिक सत्संग समिति, पतंजलि योग समिति और भारत स्वाभिमान परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आर्य समाज के संस्थापक, महान समाज सुधारक और वेदों के पुनर्जागरणकर्ता महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती का बलिदान दिवस श्रद्धा एवं संकल्प के साथ मनाया गया। उल्लेखनीय है कि कार्तिक अमावस्या 1883 ईस्वी को महर्षि दयानंद ने अपनी इहलीला समाप्त की थी। कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ अग्निहोत्र यज्ञ में आहुति दी। वातावरण वेदध्वनि से गूंज उठा और प्रतीत हुआ मानो ज्योति से ज्योति जलाने की परंपरा आज भी जीवंत है।

मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित गुरुकुल प्रभात आश्रम मेरठ के आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद के विचारों को आज भी समाज पूर्ण रूप से नहीं समझ पाया है। लोग वेदों को मानते हैं, किंतु जानते नहीं हैं। स्वामी दयानंद ने वेदों की ओर लौटो का जो संदेश दिया, वही मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का दीप है। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानंद के जीवन में ‘दया’ और ‘आनंद’ के दो भाव प्रमुख थे। यदि मनुष्य इन दोनों को अपने भीतर जगा ले तो यह जगत स्वयं आलोकित हो जाएगा। उन्होंने यज्ञ को वैज्ञानिक दृष्टि से स्थापित करते हुए कहा कि शुद्ध वायु, शुद्ध विचार और शुद्ध समाज के लिए यज्ञ आवश्यक है।

आचार्य आर्य ने कहा कि जीवन को बदलने के लिए केवल ज्ञान ही नहीं, ध्यान और आत्मचिंतन भी उतना ही आवश्यक है। संस्कृत ग्रंथ कादंबरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यौवन, धन, अधिकार और विवेक—इन चारों में से कोई एक भी यदि नियंत्रण से बाहर हो जाए तो मनुष्य विनाश की ओर बढ़ता है। स्वामी दयानंद ने इसी विवेक की ज्योति जगाई थी। स्वामी दयानंद ने कहा था कि आप अपने लिए स्वतंत्र हैं किंतु जब आप सामाजिक जीवन जीते हैं तो आप सार्वजनिक हित के लिए परतंत्र है यह एक अद्भुत जीवन दर्शन है। स्वामी दयानंद ने सिर्फ कठोरता से अंधविश्वास का विरोध नहीं किया था उन्होंने कहा था कि हम सबको प्रीति पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। स्वामी दयानंद के जीवन में अद्भुत करुणा का समावेश है। सत्य और ज्ञान का प्रकाश ही सच्चा प्रकाश है।

कार्यक्रम का संचालन राकेश दुबे ने किया। उन्होंने कहा कि दीपावली पर हर कोई बाहर रोशनी करता है, पर भीतर के अंधेरे को जलाना भूल जाता है। स्वामी दयानंद ने सिखाया कि असली दीपक वह है जो अपने भीतर से प्रकाश फैलाए। उन्होंने हल्के व्यंग्य में कहा कि आज घरों में पूछा जाता है कहां जा रहे हो, क्यों जा रहे हो? पर जब समाज में अंधेरा फैले तो किसी एक घर का उजाला भी अधूरा है। ऋषि दयानंद के दीप से ही समाज के दीप जलते जा रहे हैं।

पतंजलि योग समिति के नवीन यदु और रवि ने कहा कि जीवन में जो भी सकारात्मक परिवर्तन आया है, उसका श्रेय ऋषि दयानंद की प्रेरणा को जाता है। चतुर्भुज अग्रवाल ने घोषणा की कि समाज में वैदिक चेतना जगाने हेतु प्रति माह एकादश कुंडी महायज्ञ का आयोजन किया जाएगा। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए राजेंद्र अग्निहोत्री ने सत्यार्थ प्रकाश और संस्कार विधि जैसे ग्रंथों का उल्लेख किया तथा कहा कि आचार्य डॉ. अजय आर्य ने जो विचार रखे वे केवल सुनने के लिए नहीं, जीवन में उतारने के लिए हैं।

दीपावली का छोटा-सा दिया हमें जीवन का बड़ा दर्शन सिखाता है। एक दीप अपनी रोशनी से जब दूसरे दीप को जलाता है, तभी उसकी ज्योति सार्थक होती है। स्वामी दयानंद का जीवन भी ऐसा ही दीप था, जिसने अपने प्रकाश से अनगिनत आत्माओं को जाग्रत किया। आज जब समाज फिर से भ्रम, भोग और विभाजन के अंधकार में भटक रहा है, तब ऋषि दयानंद की ज्योति हमें याद दिलाती है—अंधकार को कोसने से बेहतर है कि एक दीप जलाया जाए।

शांति पाठ और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। अंत में एक ही भाव सबके मन में गूंजता रहा—दीप केवल जलाने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की दिशा है।

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