पटना। चुनाव आयोग द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखों के ऐलान के साथ ही राज्य की सियासत में सरगम तेज हो गई है। अब पूरा बिहार दो चरणों — 6 और 11 नवंबर — को वोट डालेगा, जबकि नतीजे 14 नवंबर को आएंगे।
गली-मोहल्लों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह एक ही चर्चा है — इस बार कौन मारेगा बाज़ी?
इसी बीच MATRIZE-IANS ओपिनियन पोल ने इस चुनावी माहौल में नई हलचल मचा दी है। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि बिहार की सियासी जंग इस बार बेहद दिलचस्प और कांटे की होने वाली है।

मोदी फैक्टर का असर बरकरार
सर्वे के मुताबिक 57% लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का बिहार चुनाव पर गहरा असर पड़ रहा है।
केवल 8% लोगों ने कहा कि इसका थोड़ा असर है, जबकि 21% ने माना कि अब मोदी फैक्टर का असर नहीं बचा।
राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि यह आंकड़ा बताता है — एनडीए की चुनावी नाव को अब भी “मोदी लहर” का सहारा मिल रहा है।
NDA को बढ़त, पर मुकाबला कांटे का
243 सीटों वाले बिहार विधानसभा चुनाव में इस सर्वे के अनुसार एनडीए बहुमत के बेहद करीब पहुंच सकता है।
भाजपा (BJP): 80-85 सीटें
जनता दल यूनाइटेड (JDU): 60-65 सीटें
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM): 3-6 सीटें
लोक जनशक्ति पार्टी (LJP): 4-6 सीटें
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM): 1-2 सीटें
कुल मिलाकर एनडीए को 150-160 सीटों के बीच सफलता मिलने का अनुमान है।
महागठबंधन की मुश्किलें बरकरार
वहीं महागठबंधन के लिए यह सर्वे थोड़ी चिंता की बात लेकर आया है।
राजद (RJD): 60-65 सीटें
कांग्रेस (INC): 7-10 सीटें
सीपीआई (ML): 6-9 सीटें
सीपीएम: 0-1 सीट
वीआईपी पार्टी: 2-4 सीटें
यानी महागठबंधन को 75-85 सीटों के बीच सीमित रहने का अनुमान है।
‘जनसूराज’ और प्रशांत किशोर का नया समीकरण
राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (PK) इस बार अपनी नई राजनीतिक यात्रा “जनसूराज” के साथ मैदान में हैं।
सर्वे बताता है कि उनका फैक्टर कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है। विश्लेषक मानते हैं कि कुछ इलाकों में PK का असर एनडीए और महागठबंधन दोनों के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है।
पिछले चुनाव की तुलना में
2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 125 सीटें, और महागठबंधन को 110 सीटें मिली थीं।
इस बार का सर्वे साफ़ इशारा दे रहा है कि एनडीए की स्थिति पहले से मजबूत दिखाई दे रही है, जबकि विपक्षी खेमे को अपनी रणनीति पर दोबारा मंथन करना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
बिहार की चुनावी तस्वीर अब धीरे-धीरे साफ़ होती जा रही है —
एक ओर मोदी की लोकप्रियता, नीतीश कुमार का अनुभव और एनडीए का संगठनात्मक ढांचा,
तो दूसरी ओर लालू यादव की परंपरा, तेजस्वी की युवाशक्ति और महागठबंधन का समीकरण।
कुल मिलाकर, बिहार की सियासी जंग इस बार भी दिलचस्प मोड़ लेने वाली है।




