बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार मित्र सुरेश महापात्रा के फेसबुक वाल से ऐतिहासिक बस्तर दशहरा उत्सव पर लेख पढ़ने को मिला । हम अपने मंच पर भी उक्त लेखक को यथावत प्रस्तुत कर रहे है। धन्यवाद सुरेश भाई|
बस्तर दशहरा, जिसे विश्व का सबसे लंबा त्योहार माना जाता है, छत्तीसगढ़ के दक्षिण में बस्तर क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का अनुपम प्रतीक है। यह 75 से 77 दिनों तक चलने वाला पर्व (श्रावण अमावस्या से शुरू होकर आश्विन नवरात्रि के बाद समाप्त होता है) जिसमें पारंपरिक रूप से रावण दहन की परंपरा कभी नहीं रही। बस्तर दशहरा राम-रावण की कथा से जुड़ा नहीं है, बल्कि स्थानीय आराध्य देवी माता दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना और आदिवासी संस्कृति के सामूहिक उत्सव पर केंद्रित है। यह त्योहार काकतीय राजवंश (14वीं शताब्दी) से जुड़ा है और नागा व काकतीय प्रभावों का मिश्रण दर्शाता है।
दंतेवाड़ा में स्थित माता दंतेश्वरी का मंदिर पुरातात्विक धरोहर है। बस्तर राज में सदियों से मनाए जा रहे दशहरा पर्व में इसका ऐतिहासिक महत्व और दंतेवाड़ा से जगदलपुर की यात्रा को समझना चाहिए।

माता दंतेश्वरी बस्तर राजवंश की कुलदेवी हैं और दंतेवाड़ा स्थित उनका प्राचीन मंदिर भारत के 52 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को 51 (या 108) टुकड़ों में विभाजित किया, तो उनके दांत (दंत) का टुकड़ा दंतेवाड़ा क्षेत्र में गिरा, जिससे यह ‘दंतेश्वरी’ शक्तिपीठ बना।
मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में चालुक्य राजाओं (काकतीय वंश) द्वारा किया गया था, जब राजा अन्नमदेव ने वारंगल से दंडकारण्य (बस्तर) की ओर प्रस्थान किया।
इससे पहले यहाँ नागा वंश (760-1324 ई.) के दौरान ‘मणिकेश्वरी’ के नाम से जाना जाता था। मंदिर का पुनर्निर्माण स्वतंत्रता पूर्व (1947 से पहले) हुआ, जिसमें गर्भगृह, महामंडप, मुख्यमंडप और सभामंडप जैसे चार मुख्य भाग हैं। मूर्ति काले पत्थर से बनी है। दक्षिण बस्तर के बारसूर में जहाँ बत्तीसा मंदिर है साथ ही वहाँ पुरातात्विक महत्व के कई अवशेष भी हैं उन मंदिरों में चाहे शिवलिंग हो या मूर्तियों में काले पत्थरों का प्रयोग किया गया है। ऐसे ही काले पत्थर से माता दंतेश्वरी की प्रतिमा गढ़ी गई है।
बस्तर दशहरा में माता दंतेश्वरी की भूमिका केंद्रीय है। यह पर्व माता की विजय और बस्तर की रक्षा के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि (महाअष्टमी) को माता की डोली (पालकी) और छत्र (छाता) दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए प्रस्थान करती हैं, ताकि वे बस्तर दशहरा में शामिल हो सकें। यह यात्रा एक भव्य जुलूस के रूप में होती है, जिसमें बस्तर के सभी आदिवासी समुदाय के सदस्यों के साथ स्थानीय प्रशासन और निवासी भी शामिल होते हैं। मंगलवार को अष्टमी तिथि पर माँ दंतेश्वरी की यात्रा जगदलपुर के लिए प्रस्थान हुई।

ऐतिहासिक रूप से, यह परंपरा 15वीं शताब्दी से चली आ रही है, जब काकतीय राजा पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथ पुरी यात्रा से प्रेरित होकर रथयात्रा की शुरुआत की। वे ‘रथपति’ की उपाधि धारण कर लौटे और माता दंतेश्वरी को सम्मानित करने के लिए यह रिवाज शुरू किया। आज भी बस्तर राजपरिवार पंचमी तिथि पर दंतेवाड़ा पहुंचकर निमंत्रण की परंपरा का निर्वाह करता है। राज्याभिषेक के बाद से महाराजा कमलचंद भंजदेव इसका विधिवत निर्वाह कर रहे हैं।
उन्होंने बीते नवरात्रि पंचमी को दंतेवाड़ा जाकर माता को निमंत्रण दिया।
मावली परघाव की रस्म का ऐतिहासिक संदर्भ ‘मावली परघाव’ रस्म नवरात्रि की नवमी तिथि को संपन्न होती है, जो बस्तर दशहरा का एक प्रमुख अनुष्ठान है। ‘मावली’ माता दंतेश्वरी की बड़ी बहन (या संरक्षक देवी) मानी जाती हैं, जो दंतेवाड़ा के मावली मंदिर में विराजमान हैं। यह रस्म दंतेश्वरी माई को जगदलपुर आमंत्रित करने के बाद स्वागत करने का प्रतीक है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह रिवाज 16वीं शताब्दी में राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा स्थापित बस्तर दशहरा का हिस्सा है, जब उन्होंने दंतेश्वरी को राज्य की अधिष्ठात्री देवी बनाया। मावली को बस्तर की प्राचीन संरक्षक देवी माना जाता है, जो काकतीय आगमन से पहले आदिवासी समुदायों की रक्षा करती थीं। रस्म में मावली माता की डोली चंदन लकड़ी को घिसकर बनाई गई लेप से बनी प्रतिमा को फूलों से सजाकर डोली में बिठाकर माता के छत्र के साथ दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाई जाती हैं।
सांस्कृतिक महत्व : यह रस्म आदिवासी एकता का प्रतीक है, जिसमें माड़िया, मुरिया और गोंड जनजातियाँ भाग लेती हैं। ऐतिहासिक ग्रंथों में इसे देवी-देवताओं के सामूहिक आगमन के रूप में वर्णित किया गया है, जो बस्तर की सामुदायिक सहकारिता को दर्शाता है। 600 वर्षों से यह अनवरत चली आ रही है।
भीतर रैनी और बाहर रैनी के रथ परिचालन का ऐतिहासिक महत्व
बस्तर दशहरा का चरमोत्कर्ष विजयादशमी (दशमी तिथि) को भीतर रैनी और बाहर रैनी की रस्मों में होता है, जिसमें 8-पहियों वाला विशालकाय रथ (रथयात्रा) परिचालित किया जाता है। यह रथ जगन्नाथ पुरी से प्रेरित है और लकड़ी ‘ठुरलू खोटला’ से बनाया जाता है।
भीतर रैनी (भीतर रैनी): दशमी की रात को जगदलपुर शहर में रथ की पहली परिक्रमा होती है। माता दंतेश्वरी का छत्र रथ पर विराजित किया जाता है, जिसे ‘दण्डामी माडिया’ जनजाति के पुरुष खींचते हैं। ऐतिहासिक रूप से, यह 15वीं शताब्दी में राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा शुरू की गई रथयात्रा का हिस्सा है, जो रथ को ‘चुराने’ की परंपरा से जुड़ी है। रात में रथ को माड़िया-मुरिया आदिवासी कुम्हड़ाकोट जंगल ले जाते हैं (चोरी का प्रतीकात्मक अनुष्ठान है), जो राज्य की एकता और देवी की विजय दर्शाता है। वातावरण में आंगा देव के साथ नृत्य होता है।
बाहर रैनी (बाहर रैनी): अगले दिन (दशमी के बाद) राजा और राजपरिवार कुम्हड़ाकोट पहुँचकर आदिवासियों को मनाते हैं। वहां नवाखाई की रस्म करते हैं, इसके बाद रथ को शाही जुलूस में वापस लाते हैं। (इस रथ पर अंतिम बार 60 बरस पहले महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव महारानी के साथ सवार हुए थे। उनके निधन के बाद से यह रिवाज बंद कर दिया गया है।) यह रस्म ‘नवाखानी पर्व’ भी कहलाती है, जिसमें बस्तर संभाग के देवी-देवताओं के छत्र शामिल होते हैं। ऐतिहासिक रूप से, यह काकतीय काल की राजकीय सभा (मुरिया दरबार) से जुड़ी है, जहाँ जनजातीय प्रतिनिधि राजशाही के दौर से नियुक्त माँझी, चालकी अपनी मांगें रखते थे। (जिन्हें अब परंपरागत तौर पर उनके परिवार के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। अब भी मुरिया दरबार की परंपरा का निर्वाह होता है इसमें राज्य के मुख्यमंत्री और निर्वाचित जनप्रतिनिधि मंच पर रहते हैं।) यह रस्म बस्तर दशहरा में रथ परिक्रमा का समापन करती है।

ये रस्में 600+ वर्ष पुरानी हैं, जो आदिवासी-राजकीय सामंजस्य को प्रतिबिंबित करती हैं। बस्तर दशहरा न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक एकता का माध्यम भी, जिसमें लाखों आदिवासी भाग लेते हैं। यह यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के लिए नामांकित है।




