Friday, January 16, 2026

एक मंदिर ऐसा भी जहां पूरे विधि-विधान से होती है श्रीगणेश और माता रिद्धी-सिद्धी का विवाह 50 साल पुरानी हैं सेक्टर 5 की श्री सिद्धी विनायक मंदिर

आनंद शर्मा भिलाई। प्रदेश में भगवान श्रीगणेश का एक ऐसा भी मंदिर है, जो अपने आप में ही अद्भुत है। इस मंदिर की बनावट से लेकर यहां के पूजा-पाठ,विधि-विधान सब अन्य जगहों से अलग है।इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस मंदिर में भगवान गणेश की माता रिद्धी-सिद्धी के साथ विवाह किया जाता है। जिस तरह से साउथ इंडियन हिन्दू रीति रिवाज से शादी होती है, सेम टू सेम उसी तरह से पूरे विधि विधान के साथ शादी की जाती हैं। हर साल भक्तों को भगवान की शादी में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

मंदिर में मंडप सजाई जाती है। भगवान श्री गणेश को हल्दी लगाया जाता है। माता रिद्धी-सिद्धी को बिहाने के लिए भगवान पूरे ठाठबाट के साथ बारात लेकर जाते हैं। शादी में फेरे से लेकर सभी रश्मों को बड़ी सुंदरता और पवित्रता से निभाई जाती है। विवाह में शामिल होने पर ऐसा लगता है कि मानो साक्षात हम भगवान की शादी में उपस्थित हैं। हर वो रश्म जो शादी में होती है, वह यहां निभाई जाती है। यह आयोजन हर साल गणेश चतुर्थी के 7 वें दिन किया जाता है। इस साल भी किया जाएगा। इसकी तैयारी चल रही है। इसके अलावा यहां रोज गणेशोत्सव पर रोज अलग-अलग तरह से पूजा आरती की जा रही है। कहते हैं कि जब मंदिर बना तक यह शर्त थी कि मंदिर के सामने कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। आजतक सामने कोई निर्माण नहीं हुआ है और जो सामने रास्ता है, उस रास्ते का अंत भी नहीं है।

1972 में हुई थी मंदिर की स्थापना
मंदिर समिति के सचिव स्वामीनाथन ने बताया कि मंदिर का निर्माण 1962 में शुरू हुआ था, लेकिन यह 1972 में 10 साल में बन कर तैयार हुआ। मंदिर का निर्माण कांशीपीठ के शंकराचार्य ने कराई थी। उन्होंने वहां से आर्किटेक्ट भेेजे थे। मंदिर की पूरी संरचना साउथ इंडियन मंदिरों के इस्टाइल में है। भगवान श्री सिद्धी विनायक की मूर्ति 5 फिट की है। जो चेन्नई के पास मघाबलीपुरम में संचालित मूर्ति कला के यूनिवसिर्टी के विशेषज्ञों ने बनाई थी। मंदिर में उपयोग किए गए एक-एक साउथ इंडिया से मंगाई गई है।

नीबू का दीया बनाकर करते हैं आरती
साउथ की पुरानी मूर्ति-मंदिर कलाओं को अपने में संजोए इस श्री सिद्धि विनायक मंदिर में भगवान श्रीगणेश के साथ ही उनके भाई भगवान कार्तिके भी विराजमान हैं। इसके अलावा माता दुर्गा, नव ग्रह भी है। यहां ग्रह दोष के लिए विशेष पूजा होती है। नीबू का दीया बनाकर पूजा की जाती। यहां भक्तों को सीधे पूजा नहीं करते, यहां के चारों वेद के ज्ञाता पंडित भक्तों का नाम, गोत्र, पता आदि पूछ कर पूजा करते हैं और उनके नाम से फल-फूल चढ़ाते हैं यही नहीं भक्तों की मनोकामना को भी पंडित ही भगवान को बताते हैं।

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